श्रीमद्भगवद्गीता

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Bhagavad Gita 11.53

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जिस प्रकार तुमने मुझे देखा है, इस प्रकारका (चतुर्भुजरूपवाला) मैं न तो वेदोंसे, न तपसे, न दानसे और न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Sri Krishna says, "I cannot be seen in such a form as You have seen Me, not by the Vedas, nor by austerities, nor by gifts, nor by sacrifice."

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

भगवान अब पिछले वचन को और स्पष्ट करते हैं, उन साधनों की बात दोहराते हुए जो इस दर्शन तक नहीं ले जाते। 'नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया', न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से, 'शक्य एवंविधो द्रष्टुम्', इस प्रकार का मैं देखा जा सकता हूँ, 'दृष्टवानसि मां यथा', जैसा तुमने मुझे देखा है। भगवान ने यह बात अड़तालीसवें श्लोक में भी कही थी, और अब फिर कह रहे हैं। यह दोहराव जान-बूझकर है। मनुष्य का मन बार-बार यह सोचता है कि यदि मैं पर्याप्त पढ़ूँ, पर्याप्त तप करूँ, पर्याप्त दान दूँ, तो भगवान मुझे मिल जाएँगे। मानो भगवान कोई वस्तु हों जिन्हें पर्याप्त मूल्य देकर प्राप्त किया जा सके। भगवान इस भ्रम को दो बार तोड़ते हैं। वेद, तप, दान, यज्ञ, ये चारों धर्म के महान स्तम्भ हैं, और भगवान इनका अनादर नहीं कर रहे। वे केवल यह बता रहे हैं कि ये साधन हैं, साध्य नहीं। इनसे हृदय शुद्ध होता है, पर इनसे भगवान मोल नहीं लिए जा सकते। जैसे कोई भूमि को जोतता है, बीज बोता है, सींचता है, पर वर्षा उसके हाथ में नहीं होती, वह आकाश से आती है। साधना भूमि तैयार करती है; दर्शन कृपा की वर्षा है। यह श्लोक आपको अगले श्लोक के उत्तर के लिए तैयार करता है। प्रश्न यह है: यदि इनसे नहीं, तो किससे? उस उत्तर को सुनने के लिए अपना हृदय खुला रखिए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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