श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 41/5575%

Bhagavad Gita 11.41

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तंहे कृष्ण हे यादव हे सखेति।अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 41–42) आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए 'मेरे सखा हैं' ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक (बिना सोचे-समझे) 'हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखे !' इस प्रकार जो कुछ कहा है; और हे अच्युत ! हँसी-दिल्लगीमें, चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते समयमें अकेले अथवा उन सखाओं, कुटुम्बियों आदिके सामने मेरे द्वारा आपका जो कुछ तिरस्कार किया गया है; वह सब अप्रमेयस्वरुप आपसे मैं क्षमा माँगता हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Unaware of Your majesty, and either out of negligence or love, or considering You to be a friend, whatever I have said rudely, such as 'O Krsna, O Yadava, O Comrade,'

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

स्तुति के बीच अचानक अर्जुन के हृदय में एक पीड़ा उठती है, और यह श्लोक गीता के सबसे मार्मिक श्लोकों में से एक बन जाता है। यह भाव अगले श्लोक में पूरा होता है। 'सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तम्', आपको सखा मानकर मैंने हठपूर्वक जो कुछ कहा, 'हे कृष्ण हे यादव हे सखेति', 'हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा', इस प्रकार, 'अजानता महिमानं तवेदम्', आपकी इस महिमा को न जानते हुए, 'मया प्रमादात्प्रणयेन वापि', प्रमाद से या प्रेम से। अब अर्जुन को स्मरण आता है वह सारा जीवन जो उसने श्रीकृष्ण के साथ बिताया था। उसने उन्हें 'हे कृष्ण', 'हे यादव', 'हे सखा' कहकर बुलाया था, जैसे कोई अपने मित्र को बुलाता है। कभी हँसी में, कभी अधिकार से, कभी बिना सोचे। और अब, जब उसने उनका विराट रूप देख लिया, तो उसे लगता है कि उसने कितनी बड़ी भूल की। पर इस श्लोक का सबसे कोमल शब्द है 'प्रणयेन वापि', या प्रेम से। अर्जुन स्वयं स्वीकार करता है कि उसका वह व्यवहार अनादर से नहीं, प्रेम से था। जिसे वह 'हे सखा' कहता था, वह भाव कभी तुच्छ नहीं था। और परम्परा के अनेक संत कहते हैं कि भगवान को अर्जुन का वह सखा-भाव उसके इस भयभीत आदर से अधिक प्रिय था। यह श्लोक आपको एक सुन्दर सत्य बताता है: भगवान के साथ सहज, आत्मीय सम्बन्ध अनादर नहीं है। आप उन्हें मित्र की भाँति पुकार सकते हैं, यदि उसमें प्रेम है। प्रेम की सहजता कभी अपराध नहीं होती।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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