श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 28/5551%

Bhagavad Gita 11.28

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाःसमुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति।तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जैसे नदियोंके बहुत-से जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं, ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

As many torrents of rivers flow towards the ocean, so do these heroes of the world of men enter into Your flaming mouths.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अब अर्जुन इस भयावह दृश्य को एक उपमा से समझने का प्रयत्न करता है, और यह उपमा उसमें एक अद्भुत स्वाभाविकता ले आती है। 'यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः', जैसे नदियों के अनेक जल-प्रवाह, 'समुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति', समुद्र की ओर ही दौड़ते हैं, 'तथा तवामी नरलोकवीराः', वैसे ही ये मनुष्यलोक के वीर, 'विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति', आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। इस उपमा पर ध्यान दीजिए। नदियाँ समुद्र की ओर क्यों बहती हैं? कोई उन्हें धकेलता नहीं; यह उनका स्वभाव है। गीता प्रेस इसे 'स्वाभाविक ही' कहती है। वे पर्वतों से निकलती हैं, मैदानों में होकर बहती हैं, और अन्त में समुद्र में मिल जाती हैं, क्योंकि वहीं से उनका जल आया था। यह मिलना नाश नहीं, घर लौटना है। अर्जुन इसी उपमा से उन वीरों को देख रहा है। वे भी अपने जीवन की यात्रा पूरी करके उसी में लौट रहे हैं जिससे वे आए थे। यह उपमा पिछले श्लोक की भयावहता को एक गहरी शान्ति में बदल देती है। काल का मुख भयानक लगता है, पर वह भी उसी समुद्र का द्वार है जिसमें सब जीवन विलीन होता है। ध्यान दीजिए कि अर्जुन उन्हें 'नरलोकवीराः', मनुष्यलोक के वीर कहता है। वह उनका सम्मान अन्त तक नहीं छोड़ता। यह श्लोक आपको मृत्यु को एक भिन्न दृष्टि से देखना सिखाता है: नदी का समुद्र में मिलना। जीवन जहाँ से आया, वहीं लौटता है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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