यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाःसमुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति।तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति
yathā nadīnāṁ bahavo ’mbu-vegāḥ samudram evābhimukhā dravanti tathā tavāmī nara-loka-vīrā viśhanti vaktrāṇy abhivijvalanti
as
of the rivers
many
water waves
the ocean
indeed
toward
flowing rapidly
similarly
your
these
kings of human society
enter
mouths
blazing
अर्थMeaning
जैसे नदियोंके बहुत-से जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं, ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
As many torrents of rivers flow towards the ocean, so do these heroes of the world of men enter into Your flaming mouths.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अब अर्जुन इस भयावह दृश्य को एक उपमा से समझने का प्रयत्न करता है, और यह उपमा उसमें एक अद्भुत स्वाभाविकता ले आती है। 'यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः', जैसे नदियों के अनेक जल-प्रवाह, 'समुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति', समुद्र की ओर ही दौड़ते हैं, 'तथा तवामी नरलोकवीराः', वैसे ही ये मनुष्यलोक के वीर, 'विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति', आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। इस उपमा पर ध्यान दीजिए। नदियाँ समुद्र की ओर क्यों बहती हैं? कोई उन्हें धकेलता नहीं; यह उनका स्वभाव है। गीता प्रेस इसे 'स्वाभाविक ही' कहती है। वे पर्वतों से निकलती हैं, मैदानों में होकर बहती हैं, और अन्त में समुद्र में मिल जाती हैं, क्योंकि वहीं से उनका जल आया था। यह मिलना नाश नहीं, घर लौटना है। अर्जुन इसी उपमा से उन वीरों को देख रहा है। वे भी अपने जीवन की यात्रा पूरी करके उसी में लौट रहे हैं जिससे वे आए थे। यह उपमा पिछले श्लोक की भयावहता को एक गहरी शान्ति में बदल देती है। काल का मुख भयानक लगता है, पर वह भी उसी समुद्र का द्वार है जिसमें सब जीवन विलीन होता है। ध्यान दीजिए कि अर्जुन उन्हें 'नरलोकवीराः', मनुष्यलोक के वीर कहता है। वह उनका सम्मान अन्त तक नहीं छोड़ता। यह श्लोक आपको मृत्यु को एक भिन्न दृष्टि से देखना सिखाता है: नदी का समुद्र में मिलना। जीवन जहाँ से आया, वहीं लौटता है।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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