श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 33/5560%

Bhagavad Gita 11.33

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्वजित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।मयैवैते निहताः पूर्वमेवनिमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धन-धान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो। ये सभी मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन् ! तुम निमित्तमात्र बन जाओ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Therefore, arise, win glory. Conquering your foes, enjoy a prosperous kingdom. By Me they have already been slain. You be merely an instrument, O Arjuna, you great archer!

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

काल के रूप में अपना परिचय देने के बाद भगवान अर्जुन को एक स्पष्ट आदेश देते हैं, और उसमें एक गहरा रहस्य छिपा है। 'तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व', इसलिए तुम उठो और यश प्राप्त करो, 'जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्', शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग करो; 'मयैवैते निहताः पूर्वमेव', ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, 'निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्', हे सव्यसाची, तुम केवल निमित्त बन जाओ। इस श्लोक का सबसे प्रसिद्ध और सबसे गहरा शब्द है 'निमित्तमात्रम्', केवल निमित्त, केवल एक साधन। भगवान कहते हैं कि जो होना है, वह मेरे संकल्प से पहले ही हो चुका है। तुम्हें केवल उस संकल्प का माध्यम बनना है। जैसे एक बाँसुरी स्वयं संगीत नहीं रचती; संगीत बजानेवाले के श्वास से आता है, बाँसुरी केवल उसका माध्यम है। यह भाव कर्ता होने के बोझ को हटा देता है। जब अर्जुन मानता था कि वह स्वयं इन सबको मारेगा, तो उसका हृदय पाप के भय से काँपता था। पर अब उसे दिखता है कि वह कर्ता नहीं, केवल एक साधन है। यह उसे उसके कर्तव्य से मुक्त नहीं करता, बल्कि उसे अहंकार और अपराध-बोध के बिना कर्तव्य करने की शक्ति देता है। 'सव्यसाचिन्', जो दोनों हाथों से बाण चला सकता है, यह सम्बोधन उसे उसकी अपनी क्षमता का स्मरण कराता है। यह श्लोक आपको एक मुक्त जीवन का सूत्र देता है: अपने हर कर्म में स्वयं को भगवान के हाथ का एक साधन मानिए। तब सफलता का अहंकार नहीं होगा, और विफलता का बोझ भी नहीं।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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