अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्
aneka-vaktra-nayanam anekādbhuta-darśhanam aneka-divyābharaṇaṁ divyānekodyatāyudham
many
faces
eyes
many
wonderful
had a vision of
many
divine
ornaments
divine
many
uplifted
weapons
अर्थMeaning
(श्लोक 10–11) जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं, अनेक दिव्य आभूषण हैं, हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं, जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं, जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन, कुंकुम आदि लगा हुआ है, ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय, अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखवाले देव-(अपने दिव्य स्वरूप-) को भगवान् ने दिखाया।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
With innumerable mouths and eyes, many marvelous aspects, numerous divine ornaments, and numerous divine weapons.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अब संजय उस विराट रूप का वर्णन आरम्भ करते हैं, और यह वर्णन अगले श्लोक में पूरा होता है। 'अनेकवक्त्रनयनम्', जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं, 'अनेकाद्भुतदर्शनम्', अनेक अद्भुत दर्शन हैं, 'अनेकदिव्याभरणम्', अनेक दिव्य आभूषण हैं, 'दिव्यानेकोद्यतायुधम्', और हाथों में अनेक दिव्य आयुध उठे हुए हैं। इस श्लोक में 'अनेक' शब्द चार बार आता है, और हर बार वह दृश्य को और विशाल कर देता है। संजय के पास इस रूप को एक शब्द में कहने का कोई उपाय नहीं; वह केवल 'अनेक, अनेक, अनेक' कहते जाते हैं, जैसे कोई समुद्र की लहरें गिनने का प्रयत्न करे और हर बार कहे, और भी, और भी। 'अनेकवक्त्रनयनम्', अनेक मुख और नेत्र, यह चित्र हमें बताता है कि भगवान सब ओर देखते हैं, सब ओर से बोलते हैं। कोई भी स्थान ऐसा नहीं जो उनकी दृष्टि से छिपा हो। और 'उद्यतायुधम्', उठे हुए आयुध, यह संकेत है कि यह रूप केवल सौन्दर्य का नहीं, शक्ति का भी है, धर्म की रक्षा के लिए सदा तत्पर। अनेक आभूषणों की शोभा और अनेक आयुधों का तेज, दोनों एक साथ, कोमलता और पराक्रम एक ही रूप में। यह श्लोक आपको बताता है कि भगवान को किसी एक रूप में सीमित करना उनके साथ अन्याय है। वे सौम्य भी हैं और उग्र भी, शोभायुक्त भी और शक्तिमान भी। उनके हर रूप के प्रति खुले रहिए।
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
- Commentary · AI-drafted · editor-approved
No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.
- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
- Licence note (as recorded)
- Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
Found a mistake?