श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 47/5585%

Bhagavad Gita 11.47

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

श्री भगवानुवाचमया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

श्रीभगवान् बोले -- हे अर्जुन ! मैंने प्रसन्न होकर अपनी सामर्थ्यसे यह अत्यन्त श्रेष्ठ, तेजोमय, सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दिखाया है, जिसको तुम्हारे सिवाय पहले किसीने नहीं देखा है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The Lord said, "By My grace, O Arjuna, this Supreme Form, luminous, universal, infinite, and primal—never seen before by anyone but you—has been revealed to you through My own free will."

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन की प्रार्थना सुनकर भगवान बोलते हैं, और उनके स्वर में न कोई अप्रसन्नता है, न कोई कठोरता, केवल प्रेम है। 'मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्', हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर अपने योग-सामर्थ्य से यह परम रूप तुम्हें दिखाया, 'तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यम्', जो तेजोमय, विश्वरूप, अनन्त और सबका आदि है, 'यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्', जिसे तुम्हारे सिवाय पहले किसी ने नहीं देखा। इस श्लोक का पहला शब्द ही उसका हृदय है: 'मया प्रसन्नेन', मैंने प्रसन्न होकर। भगवान अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि यह दर्शन किसी कठोर तप का फल नहीं, किसी विधि का परिणाम नहीं, केवल उनकी प्रसन्नता का प्रसाद था। अर्जुन ने कुछ नहीं कमाया; भगवान ने सब दिया। और 'त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्', तुम्हारे सिवाय किसी ने नहीं देखा, यह वचन अर्जुन के लिए एक विशेष सम्मान है। अनेक ऋषियों, देवताओं, योगियों में से भगवान ने यह दर्शन केवल अर्जुन को दिया। टीकाकारों ने ध्यान दिलाया है कि दुर्योधन की सभा में या माता यशोदा को भी भगवान ने विश्वरूप की झलक दिखाई थी, पर इस विशेष रूप में, इस पूर्णता में, केवल अर्जुन ने देखा। यह श्लोक आपको बताता है कि भगवान की हर कृपा व्यक्तिगत है। वे जो आपको देते हैं, वह किसी और को उसी रूप में नहीं मिलता। अपने जीवन में आई हर कृपा को विशेष मानिए, क्योंकि वह आपके लिए ही थी।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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