श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 16/5529%

Bhagavad Gita 11.16

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे विश्वरूप ! हे विश्वेश्वरव ! आपको मैं अनेक हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंवाला तथा सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ। मैं आपके न आदिको, न मध्यको और न अन्तको ही देख रहा हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

With manifold arms, stomachs, mouths, and eyes, I behold Your infinite form on all sides. I see no end, no middle, nor the beginning of You, O Lord of the universe, O You of Universal Form.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन की दृष्टि अब उस रूप की अनन्तता में डूब जाती है, और वह उसका अन्त खोजते-खोजते थक जाता है। 'अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्', अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों वाले, 'पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्', आपको मैं सब ओर से अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ; 'नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्', न आपका अन्त, न मध्य, न आदि, 'पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप', मैं देख पा रहा हूँ, हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप। इस श्लोक में अर्जुन एक ऐसी अनुभूति से गुज़र रहा है जो विस्मय और असहायता दोनों से भरी है। वह किसी भी दिशा में देखे, उसे भुजाएँ, मुख, नेत्र दिखते हैं, और उनका कोई अन्त नहीं। जैसे कोई खुले समुद्र के बीच नौका में खड़ा होकर चारों ओर देखे, और कहीं भी तट दिखाई न दे। 'नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्', न अन्त, न मध्य, न आदि, यह पंक्ति एक गहरे सत्य का स्वीकार है। जो अनन्त है, उसका मध्य भी नहीं मिलता, क्योंकि मध्य तभी होता है जब दोनों छोर हों। हमारी बुद्धि हर वस्तु को आरम्भ और अन्त में बाँधकर समझती है, पर यहाँ वह विधि काम नहीं करती। अर्जुन यह स्वीकार कर रहा है कि उसकी समझ उस रूप के सामने छोटी पड़ गई है। यह श्लोक आपको भगवान के सामने अपनी सीमाओं को स्वीकार करना सिखाता है। उन्हें पूरा समझ लेने का आग्रह छोड़ दीजिए; जो अनन्त है, उसके सामने विस्मय से खड़े रहना ही सबसे सच्ची प्रार्थना है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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