श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 26/5547%

Bhagavad Gita 11.26

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राःसर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौसहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 26–27) हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सब-के-सब पुत्र आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कई-एक तो चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

All these sons of Dhrtarastra, together with the hosts of monarchs, Bhisma, Drona, and Karna, along with the leading warriors of our side,

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अब अर्जुन उस विराट रूप में कुछ ऐसा देखता है जो उसके हृदय को चीर देता है: युद्ध का भविष्य। यह दृश्य अगले श्लोक में पूरा होता है। 'अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे', धृतराष्ट्र के ये सब पुत्र, 'सहैवावनिपालसङ्घैः', राजाओं के समूहों के साथ, 'भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ', भीष्म, द्रोण और वह सूतपुत्र कर्ण, 'सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः', और हमारे पक्ष के मुख्य योद्धा भी। कल्पना कीजिए अर्जुन के हृदय की अवस्था। पहले अध्याय में वह इन्हीं लोगों को देखकर काँप उठा था: पितामह भीष्म, जिनकी गोद में वह खेला; गुरु द्रोणाचार्य, जिन्होंने उसे धनुर्विद्या सिखाई। और अब वह उन्हें भगवान के मुखों की ओर जाते हुए देख रहा है। जिस भविष्य से वह डरता था, वह उसकी आँखों के सामने है। पर इस श्लोक में एक बात और भी मार्मिक है: 'सहास्मदीयैरपि', हमारे पक्ष के योद्धा भी। केवल शत्रु नहीं, अपने भी। काल किसी पक्ष को नहीं देखता। यह दृश्य अर्जुन को एक गहरा सत्य दिखा रहा है: इस युद्ध का परिणाम पहले ही काल के हाथों में है। सब एक ही दिशा में जा रहे हैं, चाहे वे किसी भी पक्ष में हों। यह श्लोक आपको काल की निष्पक्षता का स्मरण कराता है। जिनसे आप प्रेम करते हैं और जिनसे आप विरोध रखते हैं, सब एक दिन उसी मार्ग पर जाएँगे। इसलिए किसी के प्रति वैर को बहुत दिन तक मत पालिए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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