श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 24/5544%

Bhagavad Gita 11.24

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्माधृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे विष्णो ! आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं, आपका मुख फैला हुआ है आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। ऐसे आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और शान्तिको प्राप्त नहीं हो रहा हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

When I behold You touching the Supreme Heaven, shining, multicolored, with yawning mouths and large, resplendent eyes, my inner being trembles in fear. I am unable to find support or peace, O Vishnu.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन का भय अब उसके अन्तःकरण तक पहुँच गया है, और वह उसे शब्दों में प्रकट करता है। 'नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णम्', आकाश को छूते हुए, प्रकाशमान, अनेक वर्णोंवाले, 'व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्', फैले हुए मुखोंवाले और प्रज्वलित विशाल नेत्रोंवाले, 'दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा', आपको देखकर मेरा अन्तःकरण भयभीत है, 'धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो', हे विष्णो, मुझे न धैर्य मिल रहा है, न शान्ति। 'धृतिं न विन्दामि शमं च', न धैर्य, न शान्ति, यह अर्जुन के हृदय की पुकार है। धृति वह शक्ति है जो मनुष्य को कठिनाई में भी स्थिर रखती है; शम वह शान्ति है जो मन को विश्राम देती है। दोनों खो गए हैं। जिस विराट रूप को देखने की उसने इतनी उत्कण्ठा से प्रार्थना की थी, वही अब उसे विचलित कर रहा है। यह एक गहरा सत्य है: भगवान का पूर्ण, अनन्त रूप मनुष्य के लिए असहनीय है। हमारा सीमित हृदय उस असीम को सह नहीं पाता, जैसे एक छोटा पात्र समुद्र को नहीं समा सकता। पर ध्यान दीजिए, इस भय के बीच भी अर्जुन उन्हें 'विष्णो' कहकर पुकारता है, उस नाम से जो पालन और संरक्षण का प्रतीक है। उसका हृदय, भय में भी, उनके रक्षक रूप की ओर मुड़ रहा है। यह श्लोक आपको बताता है कि जब जीवन में धैर्य और शान्ति खो जाएँ, तब भगवान के रक्षक नाम को पुकारिए। वह पुकार ही भय में सहारा बनती है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive
  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

Found a mistake?

आगे क्या · What next