श्रीमद्भगवद्गीता

Vishwaroopa Darshana Yogaश्लोक 14/5525%

Bhagavad Gita 11.14

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

भगवान् के विश्वरूपको देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए और आश्चर्यके कारण उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। वे हाथ जोड़कर विश्वरूप देवको मस्तकसे प्रणाम करके बोले।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Then, Arjuna, overcome with amazement, his hairs standing on end, bowed his head to the Lord and spoke with folded hands.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

इस दर्शन का अर्जुन पर क्या प्रभाव पड़ा? संजय उसका एक अत्यन्त मानवीय और मार्मिक चित्र खींचते हैं। 'ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः', तब वह धनञ्जय विस्मय से भर गया और उसका शरीर रोमांचित हो उठा, 'प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत', और वह देव को सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला। इस श्लोक में अर्जुन की तीन अवस्थाएँ एक के बाद एक आती हैं। पहली है 'विस्मयाविष्टः', विस्मय से आविष्ट, जैसे कोई भाव उस पर छा गया हो, उसे सर्वथा घेर लिया हो। दूसरी है 'हृष्टरोमा', रोमांच, जब शरीर स्वयं उस अनुभव को सह नहीं पाता और रोम-रोम खड़े हो जाते हैं। और तीसरी है 'प्रणम्य शिरसा', सिर झुकाकर प्रणाम। ध्यान दीजिए कि यह वही धनञ्जय है, धन को जीतनेवाला, महान योद्धा, जिसने अनेक युद्धों में विजय पाई, जिसने स्वयं भगवान शिव से युद्ध किया था। वही आज विस्मय से काँप रहा है और सिर झुकाए हाथ जोड़े खड़ा है। सबसे बड़ा वीर भी भगवान के सामने एक बालक बन जाता है। सच्चा दर्शन अहंकार को नहीं बढ़ाता, उसे पिघला देता है। और 'कृताञ्जलिः', हाथ जोड़े हुए, यह मुद्रा बताती है कि अब अर्जुन के हाथ धनुष के लिए नहीं, प्रणाम के लिए उठे हैं। यह श्लोक आपको बताता है कि भगवान के सान्निध्य का सबसे सच्चा लक्षण विनम्रता है। जो उन्हें जितना अधिक जानता है, वह उतना ही अधिक झुकता है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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