श्रीमद्भगवद्गीता

Sankhya Yogaश्लोक 50/7269%

Bhagavad Gita 2.50

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

बुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

A person with an evenness of mind discards both good and evil here and now. Therefore, strive for Yoga; for Yoga is skill in action.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

इस श्लोक में गीता का एक और अमर सूत्र आता है, जिसने जीवन के हर क्षेत्र में काम करने वालों को प्रेरित किया है। 'बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते', समता से युक्त व्यक्ति इसी जीवन में पुण्य और पाप, दोनों के बंधन से मुक्त हो जाता है। 'तस्माद्योगाय युज्यस्व', इसलिए योग में लग जाओ। 'योगः कर्मसु कौशलम्', योग ही कर्मों में कुशलता है। 'उभे', दोनों, यह शब्द चौंकाने वाला है। पाप से मुक्ति तो समझ में आती है, पर पुण्य से भी? भगवान का अर्थ यह है कि पुण्य कर्म भी, यदि उसके पीछे फल की आसक्ति हो, एक सुनहरी जंजीर बन जाता है। स्वर्ग का सुख भी अंततः एक बंधन है जो समाप्त होता है। समता वाला व्यक्ति कर्म करता है, पर उसके फल की गाँठ नहीं बाँधता; इसलिए न पाप उसे नीचे खींचता है, न पुण्य उसे किसी नए बंधन में बाँधता है। और 'योगः कर्मसु कौशलम्', इसका सौंदर्य यह है कि भगवान कौशल को केवल तकनीकी निपुणता नहीं कहते। सच्चा कौशल वह है जिसमें कर्म भी पूरी निपुणता से हो, और कर्म करने वाला भी उससे बँधे नहीं। जैसे एक कुशल नाविक तूफानी जल में भी नाव चलाता है, पर स्वयं डूबता नहीं। अपने कार्य को इसी दृष्टि से देखिए: उसे श्रेष्ठता से कीजिए, और फिर उसे छोड़ दीजिए। यही कर्म की सबसे बड़ी कला है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक कार्य-संस्कृति में दो बड़ी विकृतियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं: पहली, परफेक्शनिज्म का अस्वस्थ दबाव (neurotic perfectionism), जहाँ व्यक्ति हर समय आत्म-संदेह और सूक्ष्म नियंत्रण (micromanagement) के तनाव में जीता है; और दूसरी, केवल बाह्य तकनीकी दक्षता (technical efficiency) को ही सब कुछ मान लेना, भले ही उस काम को करने वाला व्यक्ति भीतर से जलकर राख हो रहा हो (burnout)। आज का मनुष्य दिन-रात काम कर रहा है, किन्तु उसका कार्य उसके लिए मुक्ति या आनंद का मार्ग बनने के बजाय एक थकाऊ मानसिक बंधन बन चुका है। भगवान श्रीकृष्ण कर्म के विज्ञान का सर्वोच्च सूत्र प्रदान करते हैं: "योगः कर्मसु कौशलम्" (कर्मों में कुशलता ही योग है)। यहाँ 'कुशलता' का अर्थ केवल मशीनी निपुणता या चतुरता नहीं है। कुशल कारीगर वह नहीं है जो काम करते समय तनाव से घिर जाए, बल्कि सच्चा कुशल वह है जो कर्म के बंधन से मुक्त रहने की कला जानता हो। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब व्यक्ति समत्व-बुद्धि से युक्त हो जाता है, तो वह जीवित रहते हुए ही कर्म के भले-बुरे मनोवैज्ञानिक बंधनों (पुण्य-पाप, प्रशंसा-निंदा के तनाव) से ऊपर उठ जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान जिसे 'फ्लो स्टेट' (flow state) कहता है—जहाँ कर्ता का अहंकार विलीन हो जाता है और केवल शुद्ध, निर्बाध क्रिया शेष रह जाती है—वह गीता के इस 'कर्म-कौशल' की एक वैज्ञानिक झलक है। जब आप कर्तापन के अहम् को त्यागकर, परिणाम की चिंता को हटाकर, कार्य को ही ईश्वर की पूजा मानकर समर्पित भाव से करते हैं, तब कर्म बोझ नहीं रहता; वह सहज, उत्कृष्ट और आनंदमय अभिव्यक्ति बन जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- गहन तल्लीनता (Flow State): कोडिंग, लेखन, अध्ययन या सर्जरी जैसे जटिल कार्यों के समय अपने ध्यान को 'मुझे इसका क्या लाभ मिलेगा' से हटाकर पूर्णतः उस क्षण की क्रिया पर एकाग्र कर दें। - मानसिक कुशलता: कार्यक्षेत्र में जब परिस्थितियाँ अनुकूल न हों, तब भी अपने मानसिक संतुलन को न खोना ही वास्तविक कुशलता है; अपनी शांति को अपनी कार्यक्षमता का आधार बनाएं। - परफेक्शनिज्म का त्याग: कार्य में अपनी ओर से 100% गुणवत्ता दें, किन्तु परिणाम को लेकर अस्वस्थ चिंता न पालें; उत्कृष्टता निष्काम भाव से की गई साधना से स्वतः प्रकट होती है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरा कार्य मेरे भीतर तनाव, थकान और अहंकार को बढ़ा रहा है, अथवा मैं उस 'कर्म-कौशल' को सीख रहा हूँ जिसमें पूर्ण कर्म करते हुए भी मन सर्वथा शांत और भारमुक्त रहता है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

मनोवैज्ञानिक मिहाई चिक्सेंटमिहाई (Mihaly Csikszentmihalyi) का "फ्लो स्टेट" (Flow State) सिद्धांत इस श्लोक का साक्षात वैज्ञानिक प्रमाण है। फ्लो अवस्था में जब व्यक्ति फल की चिंता और आत्म-सचेत अहंकार (Self-referential processing - DMN) को भूलकर क्रिया में तल्लीन हो जाता है, तब उत्पादकता और रचनात्मकता 500% तक बढ़ जाती है — यही 'कर्मसु कौशलम्' है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Translation · from the source archive

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 2.50Current VerseConcept:Yoga
🟡Philosophical Conceptदार्शनिक सूत्र

Concept: Yoga (योग)

Bhagavad Gita

Translation / Meaning (भावार्थ)

दैवीय से एकता — आध्यात्मिक अनुशासन और एकीकरण का विज्ञान।

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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