श्रीमद्भगवद्गीता

Sankhya Yogaश्लोक 65/7290%

Bhagavad Gita 2.65

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 64–65) वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

In that serenity, all sorrow is lost; for in the case of the person with a serene mind, the Buddhi is quickly established.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

पिछले श्लोक में जिस प्रसाद की बात थी, उसका फल यहाँ बताया गया है, और यह फल हर दुखी हृदय के लिए एक वचन है। 'प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते', उस प्रसाद के मिलने पर उसके सभी दुःखों का नाश हो जाता है। 'प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते', और प्रसन्न चित्त वाले की बुद्धि शीघ्र ही पूर्णतः स्थिर हो जाती है। 'सर्वदुःखानाम्', सभी दुःखों का, यह शब्द बहुत बड़ा वचन है। भगवान कुछ दुःखों की नहीं, सभी दुःखों की बात करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे व्यक्ति के जीवन में कभी कठिनाई नहीं आती, बल्कि यह कि कठिनाइयाँ उसके भीतर दुःख का रूप नहीं ले पातीं। दुःख घटना में नहीं, घटना के प्रति हमारे मन की प्रतिक्रिया में है; और जब मन निर्मल हो जाता है, तब वह प्रतिक्रिया ही बदल जाती है। इस श्लोक में एक सुंदर क्रम है: पहले चित्त प्रसन्न होता है, फिर बुद्धि स्थिर होती है। हम प्रायः उलटा सोचते हैं, कि पहले सब समझ में आ जाए, तब शांति मिलेगी। भगवान कहते हैं कि शांत, निर्मल मन में ही यथार्थ समझ उतरती है। जैसे शांत जल में ही चंद्रमा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखता है। जब कोई बड़ा निर्णय लेना हो, तो पहले अपने मन को शांत करने का समय दीजिए; उत्तर उस शांति में स्वयं प्रकट होगा।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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