यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम
yatra yogeśhvaraḥ kṛiṣhṇo yatra pārtho dhanur-dharaḥ tatra śhrīr vijayo bhūtir dhruvā nītir matir mama
wherever
Shree Krishna, the Lord of Yog
Shree Krishna
wherever
Arjun, the son of Pritha
the supreme archer
there
opulence
victory
prosperity
unending
righteousness
my opinion
अर्थMeaning
जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Wherever there is Sri Krsna, the Lord of Yoga, and Arjuna the archer, there is always fortune, victory, wealth, and sound morality. This is my firm conviction.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
गीता का यह अन्तिम श्लोक भगवान का नहीं, अर्जुन का भी नहीं, संजय का वचन है, जो इस पूरे संवाद के साक्षी रहे। धृतराष्ट्र ने गीता के पहले श्लोक में पूछा था कि युद्धभूमि में क्या हुआ। अब संजय उस प्रश्न का अन्तिम उत्तर देते हैं: 'यत्र योगेश्वरः कृष्णः', जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, 'यत्र पार्थो धनुर्धरः', जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, 'तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिः', वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है, 'मतिर्मम', ऐसा मेरा मत है। इस श्लोक में दो चित्र एक साथ हैं। 'योगेश्वर कृष्ण', जो सब योग के स्वामी हैं, ज्ञान, विवेक और कृपा के स्रोत। और 'धनुर्धर पार्थ', जिसने गाण्डीव फिर से उठा लिया है, कर्म और पुरुषार्थ का प्रतीक। पहले अध्याय में यही धनुष अर्जुन के हाथ से गिर गया था। अठारह अध्यायों की यात्रा के बाद अब वह धनुर्धर है, स्थिर मन से अपने धर्म के लिए खड़ा। भगवान की कृपा और भक्त का पुरुषार्थ, जब ये दोनों मिलते हैं, तब विजय निश्चित होती है। संजय यह बात धृतराष्ट्र से कह रहे हैं, जो अभी भी अपने पुत्रों की विजय की आशा लिए बैठे हैं। इस वचन में एक अन्तिम, कोमल चेतावनी छिपी है: विजय सेना की संख्या से नहीं, धर्म और भगवान के साथ होने से मिलती है। और 'ध्रुवा नीतिः', अचल नीति, यह बताता है कि ऐसी विजय क्षणिक नहीं, धर्म पर टिकी हुई स्थायी होती है। यह श्लोक आपके जीवन के लिए गीता का सार है। आपके रथ पर भगवान सारथी हों, और आपके हाथ में आपका कर्तव्य रूपी धनुष हो। केवल प्रार्थना पर्याप्त नहीं, केवल परिश्रम भी पर्याप्त नहीं; दोनों का मिलन ही जीवन के हर कुरुक्षेत्र में श्री और विजय लाता है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-23
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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