श्रीमद्भगवद्गीता

Vibhooti Yogaश्लोक 8/4219%

Bhagavad Gita 10.8

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

मैं संसारमात्रका प्रभव (मूलकारण) हूँ, और मुझसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है -- ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही श्रद्धा-प्रेम रखते हुए बुद्धिमान् भक्त मेरा ही भजन करते हैं -- सब प्रकारसे मेरे ही शरण होते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

I am the origin of all; from me everything proceeds. Thinking thus, the wise worship me with all devotion (Bhava).

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अब भगवान उस ज्ञान का सार चार अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोकों में देते हैं, जिन्हें परम्परा में गीता का 'चतुःश्लोकी' सार भी कहा जाता है। पहला यह है: 'अहं सर्वस्य प्रभवः', मैं सबका मूल कारण हूँ, 'मत्तः सर्वं प्रवर्तते', मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है, 'इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः', ऐसा मानकर बुद्धिमान भक्त भाव से युक्त होकर मेरा भजन करते हैं। इस श्लोक में ज्ञान और भक्ति का एक अद्भुत मिलन है। पहली पंक्ति ज्ञान है: भगवान सबका स्रोत हैं। दूसरी पंक्ति भक्ति है: जो यह जान लेता है, वह प्रेम से उनका भजन करने लगता है। ज्ञान भक्ति को जन्म देता है, जैसे यह जान लेने पर कि कोई हमारा माता-पिता है, उसके प्रति प्रेम अपने-आप उमड़ आता है। 'बुधाः', बुद्धिमान, यह शब्द ध्यान देने योग्य है। भगवान भक्तों को भावुक या अन्धविश्वासी नहीं कहते; वे उन्हें बुद्धिमान कहते हैं। सच्ची बुद्धि वही है जो अपने मूल को पहचाने। और 'भावसमन्विताः', भाव से युक्त, यह बताता है कि उनकी बुद्धि रूखी नहीं, प्रेम से भीगी हुई है। यह श्लोक आपको सिखाता है कि बुद्धि और भक्ति शत्रु नहीं, सहयात्री हैं। आप जितना गहरा सोचेंगे, उतना ही स्पष्ट होगा कि सबका स्रोत एक है; और यह स्पष्टता स्वयं प्रेम बन जाएगी।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive
  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

Found a mistake?

आगे क्या · What next