कठोपनिषद्

Vallī 1श्लोक 4/2914%

Katha Upanishad 1.4

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति ।द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उसने पिता से पूछा — "पिता, आप मुझे किसको देंगे?" दूसरी, तीसरी बार पूछने पर पिता ने क्रोध में कहा — "मृत्यु को देता हूँ तुझे!"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He said to his father: 'Father, to whom will you give me?' A second and a third time he asked. The father said in anger: 'To Death I give you!'

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

बालक का तार्किक विस्तार: यदि सब कुछ दान करना है, तो मेरा क्या? तीन बार वह प्रश्न पूछता है — और तीसरी बार में पिता क्रोध में एक भाग्यशाली किन्तु भयानक शब्द कह देता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान (Cognitive Neuroscience) के अनुसार जब मनुष्य तीव्र क्रोध या ईर्ष्या के वशीभूत होता है, तो उसका प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स (तार्किक मस्तिष्क) सुन्न हो जाता है और अमिग्डाला (भावनात्मक केंद्र) हावी हो जाता है। नचिकेता के पिता वाजश्रवस ने जब अपने बालक द्वारा बार-बार पूछे गए प्रामाणिक प्रश्न — "पिताजी! आप मुझे किसको दान करेंगे?" — को सुना, तो अपनी नैतिक दुर्बलता पकड़े जाने के कारण वे तिलमिला उठे और क्रोध में चीख पड़े — "तुझे मैं मृत्यु को देता हूँ!" यह प्रसंग क्रोध में बोले गए शब्दों की भयानक शक्ति और अनपेक्षित परिणामों को चित्रित करता है। पारिवारिक और व्यावसायिक संबंधों में अनगिनत दरारें क्रोध के उन्हीं कुछ क्षणों में बोले गए कठोर शब्दों के कारण पड़ती हैं। एक बार मुख से निकला शब्द संबंध को स्थायी रूप से बदल सकता है। किन्तु इस आख्यान का दूसरा सुंदर पहलू नचिकेता का धैर्य और साहस है; उसने पिता के क्रोधपूर्ण वाक्य को भी एक आध्यात्मिक चुनौती और साधना के अवसर के रूप में स्वीकार कर लिया।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **क्रोध में वाणी का संयम (Pause Before Speaking)**: जब भी किसी बहस या टकराव में मन में तीखा उत्तर देने का आवेग उठे, तो कम से कम 10 सेकंड का मौन लें; आवेश में कोई भी स्थायी निर्णय या अभद्र टिप्पणी न करें। - **अप्रिय परिस्थितियों का रूपांतरण**: यदि किसी ने कटुता या क्रोध में कोई नकारात्मक बात कह दी हो, तो उससे आहत होकर बैठने के स्थान पर नचिकेता की भाँति उसे अपनी चेतना को परिष्कृत करने का साधन बना लें। - **सत्य को स्वीकारने का साहस**: जब कोई अधीनस्थ या छोटा व्यक्ति हमारी नैतिक भूल या दोहरे मापदंड को उजागर करे, तो क्रोधित होने के बजाय विनम्रता से आत्म-परीक्षण करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं अपनी नैतिक असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए क्रोध और आक्रामकता का सहारा लेता हूँ, और क्या मैं आवेश में ऐसे शब्द बोल बैठता हूँ जो मेरे प्रियजनों को आहत करते हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

क्रोध पर शोध: क्रोध में बोले गए शब्द वक्ता को अवांछित सीमाओं में बाँध देते हैं। मस्तिष्क में वर्चस्व का क्षणिक आनंद दीर्घकालिक विचारों पर प्रबल हो जाता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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आगे क्या · What next