कठोपनिषद्

Vallī 1श्लोक 28/2997%

Katha Upanishad 1.28

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"अजर अमरों के पास पहुँचकर, जरा-शील मर्त्य — जानने वाला — पता है निम्न पद पर बैठा — रंग, रति, और प्रमोद के विचार में पड़कर अति-दीर्घ जीवन में कौन रमेगा?"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

'Having approached the undecaying immortals, what perishing mortal — knowing what he knows — would delight in a long life of pleasures, color, and joys?'

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

नचिकेता का आत्म-मंथन: "मुझ जैसा मर्त्य, जो अजर-अमर देवों के सान्निध्य में पहुँच चुका हो और यह जानता हो कि पृथ्वी के भोग कितने तुच्छ हैं — वह भला रूप, रति और विलास के क्षणिक आनंद में कौन मूर्ख रमेगा?"

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
नचिकेता कहता है: "अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन्। अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत॥" — जो मर्त्य मनुष्य अजर और अमर तत्त्ववेत्ताओं के सान्निध्य को प्राप्त कर चुका हो, और जो यह भलीभाँति जानता हो कि इस पृथ्वी के सारे भोग अधोगामी और नश्वर हैं, वह भला रूप, सौन्दर्य, संभोग और विलासिता के क्षणिक सुखों का चिंतन करता हुआ अति-दीर्घ जीवन में कौन रमण करना चाहेगा? यह पदानुक्रम चेतना (higher hierarchy of values) का सर्वोच्च स्तर है। अब्राहम मास्लो के 'आवश्यकता पदानुक्रम' में जब व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार (Self-Actualization) के स्तर पर पहुँचता है, तो निम्नतर शारीरिक और सुरक्षा की आवश्यकताएं अपना आकर्षण खो देती हैं। जब किसी को अमृत का स्वाद मिल जाए, तो वह गंदे नाले के पानी की ओर आकर्षित नहीं होता। नचिकेता यमराज जैसे अमर आचार्य के सम्मुख खड़ा होकर यह अनुभव कर रहा है कि आत्मा की अमरता के सामने सौ वर्षों या हजार वर्षों का सांसारिक जीवन भी केवल एक तुच्छ, उबाऊ और बंधनरूप प्रपंच मात्र है। सच्चा साधक वह है जो उच्चतर आनंद की प्राप्ति के लिए निम्नतर सुखों का सहर्ष विसर्जन कर देता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **उच्चतर लक्ष्यों से निम्नतर का त्याग**: अपने जीवन में ऐसे महान और उदात्त लक्ष्य चुनें जिनके प्रकाश में क्षुद्र प्रलोभन और आलस्य स्वतः तिरोहित हो जाएं। - **महान विभूतियों की संगति (सत्संग)**: कालजयी विचारकों, संतों और आत्मज्ञानियों के सान्निध्य और ग्रंथों में समय बिताएं; इससे आपकी दृष्टि स्वतः व्यापक और पवित्र होगी। - **उबाऊ पुनरावृत्ति से मुक्ति**: समझें कि सांसारिक भोगों में केवल एक ही ढर्रे की पुनरावृत्ति (repetition) है; वास्तविक नवीनता और चिरंतन आनंद केवल आत्म-चेतना के विस्तार में है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं अपने जीवन के अमूल्य समय को उन्हीं पुराने, घिसे-पिटे शारीरिक और मानसिक भोगों की पुनरावृत्ति में गंवा रहा हूँ, अथवा मेरी दृष्टि किसी शाश्वत और असीम आनंद पर टिकी है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

तुलनात्मक चेतना और मूल्यों का पदानुक्रम: जब मनुष्य को उच्चतर और शाश्वत आनंद की झलक मिल जाती है, तो निम्नतर संवेदी आकर्षण अपना प्रभाव स्वतः खो देते हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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आगे क्या · What next