कठोपनिषद्

Vallī 1श्लोक 19/2966%

Katha Upanishad 1.19

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"हे नचिकेता! यही स्वर्ग्य अग्नि है जिसे तूने दूसरे वर में माँगा था। लोग इस अग्नि को तेरे नाम से ही पुकारेंगे। अब, हे नचिकेता, तीसरा वर माँग।"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

(Yama:) 'Naciketas, this is the heaven-leading fire which you chose as your second boon. People will speak of this fire by your name. Now, Naciketas, ask the third boon.'

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

दूसरे वरदान की पूर्णता: यमराज कहते हैं — "हे नचिकेता! यह तुम्हारी स्वर्ग्य अग्नि का वरदान पूर्ण हुआ जिसे तुमने मांगा था। अब तुम अपना तीसरा वरदान मांगो।"

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज ने नचिकेता के दूसरे वरदान को न केवल पूर्ण किया, बल्कि उसे यह स्मरण भी कराया: "हे नचिकेता! यह तुम्हारी माँगी हुई स्वर्ग्य अग्नि है, जिसे लोग अब तुम्हारे नाम से कहेंगे। अब तुम अपना तीसरा वर मांगो।" यह प्रसंग जीवन की यात्रा में सोपानों के महत्व को दर्शाता है। भौतिक समृद्धि, स्वर्गिक सुख और लौकिक सफलताएँ जीवन के मध्यवर्ती पड़ाव हो सकते हैं, किन्तु वे अंतिम गंतव्य नहीं हैं। यमराज नचिकेता को अगले और सर्वोच्च लक्ष्य की ओर अग्रसर होने का अवसर दे रहे हैं। आधुनिक मनुष्य प्रायः जीवन के पहले या दूसरे पड़ाव (करियर, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य) पर ही ठहर जाता है और उसी को जीवन की इतिश्री मान लेता है। नचिकेता का चरित्र हमें यह सिखाता है कि मध्यवर्ती सफलताओं का आनंद लेते हुए भी अपनी दृष्टि को परम सत्य — आत्म-ज्ञान — पर स्थिर रखना चाहिए। जब तक जीवन का अंतिम रहस्य उद्घाटित न हो जाए, तब तक साधक को रुकना नहीं चाहिए।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **मध्यवर्ती सफलताओं पर न रुकें**: जब जीवन में कोई बड़ी सफलता, पद या प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाए, तो वहीं आत्म-संतुष्ट होकर न बैठें; अपने भीतर के उच्चतर आत्मिक लक्ष्य को पहचानें। - **प्रतिबद्धताओं की पूर्णता**: अपने द्वारा किए गए वादों और उत्तरदायित्वों को यमराज की भाँति पूर्ण ईमानदारी और स्पष्टता के साथ समय पर पूरा करें। - **उच्चतर प्रश्नों की ओर प्रस्थान**: भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद अपने समय और बुद्धि को जीवन के गहरे प्रश्नों — "मैं कौन हूँ? मेरे अस्तित्व का क्या उद्देश्य है?" — की ओर मोड़ें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं जीवन की सांसारिक सफलताओं और सुख-सुविधाओं को ही अपनी अंतिम मंजिल मान बैठा हूँ, अथवा मैं अपने तीसरे और सर्वोच्च वरदान (आत्म-ज्ञान) की खोज के लिए तैयार हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

वचनबद्धता और लक्ष्य-प्राप्ति: किसी प्रतिबद्धता को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद अगले उच्चतर लक्ष्य की ओर बढ़ना ही चेतना के विकास का क्रम है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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