कठोपनिषद्

Vallī 1श्लोक 12/2941%

Katha Upanishad 1.12

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"स्वर्ग-लोक में कोई भय नहीं — वहाँ तुम नहीं हो, न जरा से डर है। भूख-प्यास दोनों को पार करके, शोक-रहित होकर, मनुष्य स्वर्ग में आनन्द भोगता है।"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

(Naciketas:) 'In heaven there is no fear of any kind; you are not there, nor is age feared. Having crossed both hunger and thirst, beyond sorrow, one rejoices in heaven.'

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

दूसरा वरदान की भूमिका: स्वर्गलोक का वर्णन जहाँ भूख, प्यास, बुढ़ापे और मृत्यु का भय नहीं है; जहाँ सब आनंद में रहते हैं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
नचिकेता अपने दूसरे वरदान की पृष्ठभूमि रखते हुए स्वर्गलोक का वर्णन करता है: "स्वर्गलोक में किसी प्रकार का भय नहीं है; वहाँ आप (मृत्यु) नहीं हैं, न ही वहाँ कोई वृद्धावस्था से डरता है। वहाँ लोग भूख-प्यास दोनों को पार करके शोकरहित होकर आनंद भोगते हैं।" यह श्लोक मानव चेतना की उस शाश्वत अभिलाषा को दर्शाता है जो शारीरिक सीमाओं, रोगों, बुढ़ापे और मृत्यु से परे एक पूर्ण, अबाध और सुरक्षित अस्तित्व की खोज करती रही है। आधुनिक बायो-टेक्नोलॉजी, क्रायोनिक्स और एंटी-एजिंग अनुसंधान भी इसी 'स्वर्ग' को भौतिक धरातल पर निर्मित करने का प्रयास कर रहे हैं — जहाँ रोग न हों, वृद्धावस्था टल जाए और जीवन लंबा हो। किन्तु उपनिषद् आगे चलकर यह स्पष्ट करेगा कि बाह्य सुखों का यह लोक भी अनित्य है। फिर भी, नचिकेता द्वारा इस अवस्था को समझना यह दर्शाता है कि भौतिक सीमाओं से परे उठने की आकांक्षा मनुष्य के बौद्धिक विकास का एक स्वाभाविक और आवश्यक सोपान है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **शारीरिक सीमाओं के प्रति सचेत प्रयास**: उत्तम आहार, योग और प्राणायाम के माध्यम से अपने शरीर को रोगों और अकाल दुर्बलता से मुक्त रखने का सात्विक प्रयास करें। - **क्षुद्र अभावों से ऊपर उठना**: भूख, प्यास, नींद और भौतिक सुख-दुख के तात्कालिक थपेड़ों से विचलित हुए बिना अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखें। - **उच्चतर आनंद की खोज**: केवल इन्द्रिय-तृप्ति के क्षणिक सुखों में न उलझें; अपने जीवन में बौद्धिक, कलात्मक और आत्मिक आनंद के आयामों को विकसित करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं केवल अपने शरीर के क्षुद्र सुख-दुखों और भयों में ही उलझा हुआ हूँ, अथवा मैं इन सीमाओं से ऊपर उठकर किसी स्थायी और उच्चतर चेतना की ओर बढ़ रहा हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सुखवाद और आदर्श लोक की संकल्पना: मानव मन सदा से एक ऐसे अवस्था की कल्पना करता रहा है जहाँ शारीरिक सीमाएं और मृत्यु का भय समाप्त हो जाए।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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आगे क्या · What next