कठोपनिषद्

Vallī 1श्लोक 10/2934%

Katha Upanishad 1.10

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो ।त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"हे मृत्यो! मेरा पिता गौतम शान्त-सङ्कल्प हो, प्रसन्न-मन हो, क्रोध-रहित हो। तेरे द्वारा भेजे जाने पर वह मुझे पहचाने और मुझसे प्रेम-पूर्वक बात करे। यह तीनों में से पहला वर मैं माँगता हूँ।"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

(Naciketas:) 'O Death, let Gautama (my father) be tranquil-minded, well-disposed, free of anger toward me. Let him recognize me when sent back by you and speak with me. This is the first of the three boons I ask.'

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

पहला वरदान: पारिवारिक शांति और सौहार्द। नचिकेता अपने पिता गौतम के क्रोध-शमन, मानसिक शांति और पुनः पहचान लिए जाने की प्रार्थना करता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
नचिकेता को जब तीनों लोकों के स्वामी से मनचाहा वरदान मांगने का अवसर मिला, तो उसने सबसे पहले अपने पिता के क्रोध की शांति, उनके चित्त की प्रसन्नता और पारिवारिक मेल-मिलाप की मांग की: "हे मृत्यो! मेरे पिता गौतम मेरे प्रति शांत-संकल्प हों, उनका क्रोध मिट जाए, और जब मैं आपके यहाँ से लौटूँ तो वे मुझे प्रेमपूर्वक पहचानें।" जिस पिता ने उसे क्रोध में मृत्यु के मुख में भेज दिया था, उसके प्रति नचिकेता के मन में किंचित् मात्र भी प्रतिशोध या कड़वाहट नहीं थी। यह नचिकेता की असीम परिपक्वता और पारिवारिक दायित्व-बोध का प्रमाण है। आधुनिक समय में कई लोग आध्यात्मिक या बौद्धिक प्रगति के नाम पर अपने परिवार और माता-पिता के प्रति कर्तव्यों की उपेक्षा कर देते हैं। उपनिषद् स्पष्ट करता है कि आंतरिक शांति की यात्रा घर की अशांति और संबंधों की कड़वाहट पर खड़ी नहीं हो सकती। जब तक पारिवारिक संबंधों में क्षमा, करुणा और सौहार्द स्थापित नहीं होता, तब तक उच्चतर आध्यात्मिक जिज्ञासा केवल एक पलायनवाद बनकर रह जाती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **पारिवारिक घावों का उपचार**: अपने माता-पिता या परिजनों के प्रति यदि कोई पुराना रोष या मनमुटाव हो, तो उसे क्षमा भाव से तुरंत समाप्त करें; संबंधों में मधुरता ही आत्मिक शांति की नींव है। - **प्रतिशोध का त्याग**: यदि किसी अपने ने कटुता में आपके साथ अनुचित व्यवहार किया हो, तो बदले की भावना रखने के बजाय उनके मानसिक कल्याण और शांति की प्रार्थना करें। - **प्राथमिकताओं का संतुलन**: अपनी बाह्य महत्वाकांक्षाओं या करियर की दौड़ में अपने परिजनों की भावनात्मक आवश्यकताओं और घर के सौहार्द को कभी दांव पर न लगाएं।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं अपने परिजनों की पुरानी भूलों को पकड़कर कड़वाहट पाल रहा हूँ, अथवा मेरे भीतर नचिकेता जैसी उदारता है जो संबंधों को पुनः प्रेम से सींच सके?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

पारिवारिक गतिशीलता (Family Dynamics): आध्यात्मिक मार्ग पर चलने से पूर्व पारिवारिक घावों को भरना और भावनात्मक सामंजस्य स्थापित करना प्राथमिक आवश्यकता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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