श्रीमद्भगवद्गीता

Karma Sanyasa Yogaश्लोक 10/2934%

Bhagavad Gita 5.10

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who acts without attachment, reposing all actions on Brahman (Prakṛti), is untouched by evil, just as a lotus leaf is untouched by water.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

यह श्लोक गीता की सबसे प्रिय उपमाओं में से एक देता है, जिसने युगों से साधकों को संसार में रहने का ढंग सिखाया है। 'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः', जो व्यक्ति अपने सारे कर्म ब्रह्म में अर्पित करके, आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, 'लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा', वह पाप से वैसे ही लिप्त नहीं होता जैसे कमल का पत्ता जल से। कमल के पत्ते को ध्यान से देखिए। वह जल में ही उगता है, जल में ही रहता है, जल ही उसका जीवन है। फिर भी उस पर जल की एक बूँद नहीं ठहरती; बूँदें मोतियों की तरह लुढ़क जाती हैं और पत्ता सूखा, स्वच्छ बना रहता है। उसे जल से भागने की आवश्यकता नहीं; उसका स्वभाव ही ऐसा है कि जल उसे भिगो नहीं पाता। यही कर्मयोगी का चित्र है। वह संसार में रहता है, कर्म करता है, संबंध निभाता है, पर संसार की कीचड़ उस पर टिकती नहीं, क्योंकि उसने अपने कर्म ईश्वर को अर्पित कर दिए हैं। उसे संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं; उसे केवल अपने भीतर वह अर्पण का भाव लाना है जो उसे कमल के पत्ते जैसा बना दे। अगली बार जब जीवन की कोई परिस्थिति आपको भीतर तक भिगोने लगे, तो इस कमल-पत्र को स्मरण कीजिए, और उस परिस्थिति को ईश्वर को सौंपकर देखिए।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक कार्य-परिवेश और सामाजिक जीवन में सबसे बड़ी मानसिक व्याधि यह है कि मनुष्य अपने व्यावसायिक जीवन की विषाक्तता, ईर्ष्या, तनाव और असफलताओं को सीधे अपने अंतर्मन पर चिपका लेता है। लोग अपने काम, पद और सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ इतना गहरा तादात्म्य (Over-Identification) स्थापित कर लेते हैं कि एक परियोजना की विफलता या किसी की कटु टिप्पणी उनके संपूर्ण आत्म-मूल्य और मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर देती है। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ कमल के पत्ते का कालजयी दृष्टांत देते हैं: "पद्मपत्रमिवाम्भसा" — जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में ही उत्पन्न होता है और जल के ही मध्य रहता है, फिर भी जल की एक बूँद भी उस पर नहीं ठहरती, ठीक उसी प्रकार जो व्यक्ति अपने कर्मों को समष्टि (ब्रह्म) में अर्पित करके और आसक्ति का त्याग करके कर्तव्य करता है, वह संसार के पाप, द्वेष और विकारों से सर्वथा अछूता रहता है। यह कर्म से भागना या उदासीनता नहीं है; यह संसार के कर्मों में पूर्ण दक्षता से संलग्न रहते हुए भी अपनी चेतना की स्वतंत्रता और अछूतेपन को बनाए रखने की सर्वोच्च मनोवैज्ञानिक कला है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- कार्यक्षेत्र में भावनात्मक सीमाएँ (Boundaries at Work): अपने कार्यों को पूर्ण निष्ठा और गुणवत्ता के साथ करें, किंतु कार्यालय की राजनीति, गपशप और नकारात्मक प्रवृत्तियों को अपने घर या अंतर्मन में प्रवेश न करने दें; दूसरों की बेचैनी को अपना तनाव न बनाएँ। - सफलता और विफलता से असंलिप्तता: जब आपका कोई बड़ा प्रोजेक्ट सफल हो, तो उस प्रशंसा को अहंकार न बनने दें; और जब असफलता मिले, तो उसे आत्म-ग्लानि में न बदलें। स्मरण रखें कि आप परिणाम नहीं, केवल एक निष्काम कर्ता हैं। - सामाजिक संसर्ग में आंतरिक शुचिता: समाज में विभिन्न प्रवृत्तियों और दुर्भावनाओं से युक्त व्यक्तियों के बीच रहना होगा; कमल की भाँति कीचड़ के मध्य रहकर भी अपने आंतरिक मूल्यों, दया और शांति को कलंकित न होने दें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या सांसारिक परिस्थितियों, कार्यस्थल की राजनीति और दूसरों की नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मेरे अंतर्मन को निरंतर विषाक्त कर रही हैं, अथवा मैं कमल-पत्र की भाँति संसार के मध्य रहकर भी अपने आंतरिक मौन और शुचिता में अडिग हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

मनोविज्ञान involvement और over-identification में अंतर करता है। व्यक्ति पूरे प्रयास से काम कर सकता है और फिर भी परिणामों से स्वस्थ दूरी रख सकता है; इससे उद्वेग-प्रतिक्रिया घटती है और लचीलापन बढ़ता है। यह श्लोक आधुनिक performance psychology से बहुत पहले उसी स्वस्थ अनासक्ति को समझाता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 5.10Current VerseChandogyChandogya Upanis…TaittiriTaittiriya Upani…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Chandogya Upanishad 3.14.1

Chandogya Upanishad (छान्दोग्योपनिषद्)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

सर्वं खल्विदं ब्रह्म

Translation / Meaning (भावार्थ)

All this is verily Brahman. Everything emerges from, is sustained by, and dissolves into Brahman.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next