श्रीमद्भगवद्गीता

Raja Vidya Yogaश्लोक 29/3485%

Bhagavad Gita 9.29

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

I am the same to all creation; there is none hateful or dear to me. But those who worship me with devotion abide in me, and I in them.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अब भगवान अपने स्वभाव का एक ऐसा पक्ष प्रकट करते हैं जो पहली दृष्टि में विरोधाभासी लगता है, पर उसमें प्रेम का पूरा रहस्य छिपा है। 'समोऽहं सर्वभूतेषु', मैं सब प्राणियों में समान हूँ, 'न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः', न कोई मेरा द्वेषी है, न कोई प्रिय। 'ये भजन्ति तु मां भक्त्या', परन्तु जो भक्ति से मेरा भजन करते हैं, 'मयि ते तेषु चाप्यहम्', वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ। पहली पंक्ति कहती है कि भगवान का कोई प्रिय नहीं, और दूसरी पंक्ति कहती है कि भक्त उनमें हैं और वे भक्तों में। क्या यह पक्षपात नहीं? इसका उत्तर एक सुन्दर उदाहरण से समझिए। सूर्य सब पर समान रूप से चमकता है, पर जो अपना द्वार खोल देता है, उसके घर में प्रकाश भर जाता है, और जो द्वार बन्द रखता है, उसके घर में अन्धकार रहता है। दोष सूर्य का नहीं, द्वार का है। भगवान का प्रेम सब पर समान बरसता है, जैसे वर्षा सब खेतों पर गिरती है। पर जो पात्र खुला है, वही भरता है। भक्ति वह खुलापन है। और 'मयि ते तेषु चाप्यहम्', वे मुझमें और मैं उनमें, यह पारस्परिकता प्रेम की सबसे ऊँची अवस्था है, जहाँ देनेवाला और लेनेवाला एक-दूसरे में समा जाते हैं। यह श्लोक आपको बताता है कि भगवान से दूरी उनकी ओर से नहीं, हमारी ओर से है। वे सदा उपस्थित हैं; हमें केवल अपना द्वार खोलना है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive
  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

Found a mistake?

आगे क्या · What next