अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्।मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्
ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṁ hutam
I
Vedic ritual
I
sacrifice
oblation
I
I
medicinal herb
Vedic mantra
I
I
also
clarified butter
I
fire
I
the act offering
अर्थMeaning
(श्लोक 16–18) क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत्का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
I am Kratu, I am the sacrifice, I am the offering to the manes, I am the herb, I am the Mantra, I am the clarified butter, I am the fire, I am the oblation.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अब भगवान एक ऐसी वाणी आरम्भ करते हैं जो तीन श्लोकों तक एक लय में बहती है, जैसे कोई यज्ञशाला में खड़ा होकर हर वस्तु की ओर संकेत करे और कहे, 'यह भी मैं हूँ।' 'अहं क्रतुरहं यज्ञः', क्रतु, अर्थात् वैदिक अनुष्ठान, मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ; 'स्वधाऽहम्', पितरों को दिया जानेवाला अन्न मैं हूँ; 'अहमौषधम्', औषध मैं हूँ; 'मंत्रोऽहम्', मन्त्र मैं हूँ; 'अहमेवाज्यम्', घृत मैं ही हूँ; 'अहमग्निः', अग्नि मैं हूँ; 'अहं हुतम्', और हवन की क्रिया भी मैं हूँ। इस श्लोक में यज्ञ का हर अंग भगवान बन जाता है: जो अर्पित होता है, जिसमें अर्पित होता है, जिस मन्त्र से अर्पित होता है, और अर्पण की क्रिया स्वयं। यह चौथे अध्याय के उस वचन का स्मरण कराता है, 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः', जहाँ अर्पण भी ब्रह्म है और आहुति भी ब्रह्म। इसका अर्थ क्या है? जब सब कुछ भगवान ही हैं, तो कोई भी कर्म उनसे बाहर नहीं। रसोई में भोजन पकाना, रोगी को औषधि देना, किसी को एक कटोरी अन्न देना, ये सब यज्ञ बन सकते हैं, यदि उन्हें इस भाव से किया जाए। 'औषधम्' शब्द विशेष रूप से कोमल है: रोग में जो उपचार काम करता है, उसमें भी वही उपस्थित हैं। यह श्लोक आपको बताता है कि पूजा केवल मन्दिर में नहीं होती। आज अपने किसी एक दैनिक कार्य को यज्ञ मानकर कीजिए, और देखिए कि वह कितना पवित्र हो उठता है।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-23
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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