श्रीमद्भगवद्गीता

Raja Vidya Yogaश्लोक 17/3450%

Bhagavad Gita 9.17

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 16–18) क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत् का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

I am the father, mother, creator, and grandfather of the universe; I am the purifier. I am the syllable Om, as well as Rk, Saman, and Yajus.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

यज्ञ के अंगों से आगे बढ़कर अब भगवान उन सम्बन्धों की बात करते हैं जो मनुष्य के हृदय के सबसे निकट हैं। 'पिताऽहमस्य जगतः', इस जगत् का पिता मैं हूँ, 'माता', माता मैं हूँ, 'धाता', धारण करनेवाला मैं हूँ, 'पितामहः', पितामह मैं हूँ; 'वेद्यं पवित्रम्', जानने योग्य और पवित्र करनेवाला मैं हूँ, 'ओंकारः', ओंकार मैं हूँ, 'ऋक् साम यजुरेव च', और ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस श्लोक का पहला भाग किसी भी हृदय को द्रवित कर देता है। भगवान स्वयं को पिता भी कहते हैं और माता भी। पिता की रक्षा और माता की ममता, दोनों एक ही में। और फिर 'पितामह', दादा, जिनका स्नेह सबसे निःस्वार्थ और सबसे धैर्यवान होता है। जो सृष्टि का कारण हैं, वे स्वयं को परिवार के इन सबसे प्रिय सम्बन्धों में प्रकट करते हैं, ताकि मनुष्य उन्हें दूर का कोई शासक नहीं, अपना आत्मीय अनुभव करे। फिर श्लोक ज्ञान की ओर मुड़ता है: ओंकार और तीनों वेद भी वही हैं। अर्थात् जो प्रेम में मिलता है, वही ज्ञान में भी मिलता है। माता की गोद और वेद का मन्त्र, दोनों एक ही की ओर ले जाते हैं। यह श्लोक आपके लिए एक कोमल निमंत्रण है: जब आप अकेले अनुभव करें, किसी सम्बन्ध के अभाव से दुखी हों, तब स्मरण कीजिए कि जो जगत् की माता और पिता हैं, वे आपके भी हैं। आप कभी अनाथ नहीं हैं।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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