श्रीमद्भगवद्गीता

Dhyana Yogaश्लोक 31/4766%

Bhagavad Gita 6.31

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

मेरेमें एकीभावसे स्थित हुआ जो योगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरेमें ही बर्ताव कर रहा है अर्थात् वह सर्वथा मेरेमें ही स्थित है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The yogi who, fixed in oneness, worships Me dwelling in all beings—he abides in Me, no matter how he may live.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

पिछले श्लोक की दृष्टि को भगवान यहाँ एक जीवन-शैली में बदल देते हैं, और यह श्लोक बताता है कि ऐसा भक्त संसार में कैसे रहता है। 'सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः', जो एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में स्थित मुझे भजता है, 'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते', वह योगी सब प्रकार से बर्ताव करता हुआ भी मुझमें ही बर्ताव करता है। 'सर्वथा वर्तमानोऽपि', सब प्रकार से बर्ताव करता हुआ भी, यह वाक्यांश एक बड़ी स्वतंत्रता देता है। ऐसे भक्त के लिए कोई विशेष स्थान, कोई विशेष मुद्रा, कोई विशेष समय आवश्यक नहीं। वह घर में हो या बाज़ार में, काम में हो या विश्राम में, बोल रहा हो या मौन हो, वह सदा ईश्वर में ही स्थित है। उसका पूरा जीवन ही पूजा बन जाता है। 'भजति', भजता है, यह शब्द इस अवस्था के मूल में प्रेम को रखता है। यह केवल ज्ञान नहीं, कि ईश्वर सबमें है; यह भजन है, उस सर्वव्यापी ईश्वर के प्रति प्रेम और सेवा का भाव। जब कोई व्यक्ति हर प्राणी की सेवा को ईश्वर की सेवा मानने लगता है, तब उसका हर कर्म भजन बन जाता है। एक अतिथि को भोजन कराना, एक रोगी की सेवा करना, एक दुखी को सांत्वना देना, सब ईश्वर का भजन है। आज किसी एक व्यक्ति की सेवा इस भाव से कीजिए कि आप उसमें बैठे ईश्वर की सेवा कर रहे हैं।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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