श्रीमद्भगवद्गीता

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Bhagavad Gita 4.9

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who thus knows in truth My divine birth and actions does not get rebirth after leaving the body; he will come to Me, O Arjuna.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

भगवान यहाँ बताते हैं कि उनके अवतार के रहस्य को जानने का फल क्या है, और यह फल अत्यंत अद्भुत है। 'जन्म कर्म च मे दिव्यम्', मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं; 'एवं यो वेत्ति तत्त्वतः', जो इसे तत्त्व से जान लेता है, 'त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति', वह शरीर छोड़ने के बाद फिर जन्म नहीं लेता, 'मामेति सोऽर्जुन', हे अर्जुन, वह मुझे प्राप्त होता है। 'दिव्य' शब्द इस श्लोक का हृदय है। भगवान का जन्म साधारण जन्म नहीं, क्योंकि वह कर्म-बंधन से नहीं, करुणा से होता है। उनके कर्म साधारण कर्म नहीं, क्योंकि उनमें कोई स्वार्थ नहीं, केवल लोक-कल्याण है। गोकुल की लीलाएँ, द्वारका का राज्य, कुरुक्षेत्र का उपदेश, सब दिव्य हैं, क्योंकि सबमें ईश्वर का प्रेम काम कर रहा है। पर केवल इसे जान लेने से मुक्ति कैसे? गीता प्रेस इस 'जानने' को 'दृढ़तापूर्वक मान लेना' कहता है। जब कोई सचमुच हृदय से मान लेता है कि ईश्वर हमारे बीच आते हैं, कि उनका प्रेम इतना वास्तविक है, तब उसका पूरा जीवन बदल जाता है। वह भय से नहीं, प्रेम से जीने लगता है। भगवान की कथाओं को केवल कहानियों की तरह मत पढ़िए; उन्हें इस भाव से पढ़िए कि यह आपके प्रति उनके प्रेम का प्रमाण है। वही भाव मुक्ति का बीज है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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