श्रीमद्भगवद्गीता

Karma Yogaश्लोक 16/4337%

Bhagavad Gita 3.16

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who does not follow the wheel thus set in motion here, lives in sin, satisfying the senses, O Arjuna; he lives in vain.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

यज्ञ-चक्र का पूरा विवेचन करने के बाद भगवान अब उस व्यक्ति की दशा बताते हैं जो इस चक्र से स्वयं को अलग कर लेता है, और उनके शब्दों में एक गहरी वेदना है। 'एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः', हे पार्थ, जो इस प्रकार चलाए गए चक्र के अनुसार नहीं चलता, 'अघायुरिन्द्रियारामः', वह पापमय जीवन वाला, केवल इन्द्रियों में रमने वाला, 'मोघं पार्थ स जीवति', व्यर्थ ही जीता है। 'मोघम्', व्यर्थ, यह शब्द हृदय को छू जाता है। भगवान ऐसे व्यक्ति को दंड नहीं देते, उसकी निंदा भी नहीं करते; वे केवल एक दुःखद सत्य कहते हैं कि उसका जीवन व्यर्थ जा रहा है। जैसे एक नदी जो सागर की ओर बहने के बजाय एक गड्ढे में रुक जाए, धीरे-धीरे गंदली हो जाती है। जो जीवन केवल अपने इन्द्रिय-सुख के लिए जिया जाए, वह जीते हुए भी अपनी सार्थकता खो देता है। 'इन्द्रियाराम', जो केवल इन्द्रियों में रमता है, यह शब्द आज के उपभोग-प्रधान युग पर भी सटीक बैठता है। जब जीवन का सारा उद्देश्य केवल अधिक पाना और अधिक भोगना हो जाए, तब वह एक खालीपन को जन्म देता है जिसे कोई भोग नहीं भर सकता। यह श्लोक हमें एक प्रश्न पूछने को कहता है: मेरा जीवन किस चक्र का अंग है? क्या वह किसी को कुछ दे रहा है, या केवल ले रहा है? उत्तर ही बताएगा कि जीवन सार्थक है या व्यर्थ।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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