श्रीमद्भगवद्गीता

Gunatraya Vibhaga Yogaश्लोक 5/2719%

Bhagavad Gita 14.5

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे महाबाहो ! प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The Gunas of Sattva, Rajas, and Tamas arise from Prakrti and bind the immutable Self in the body, O Arjuna.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

सृष्टि का रहस्य बताने के बाद भगवान अब उन तीन शक्तियों का परिचय देते हैं जो इस अध्याय का विषय हैं। 'सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः', सत्त्व, रज और तम, ये तीन गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं, 'निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्', हे महाबाहो, ये अविनाशी देही को देह में बाँध देते हैं। 'गुण' शब्द का एक अर्थ रस्सी भी होता है, और यह अर्थ इस श्लोक में बहुत सुन्दर बैठता है। तीन गुण तीन रस्सियाँ हैं, जो मिलकर एक दृढ़ बन्धन बनाती हैं। जैसे तीन धागों को बटकर बनी रस्सी अकेले धागे से कहीं अधिक दृढ़ होती है। सत्त्व, रज, तम, तीनों मिलकर आत्मा को शरीर से बाँधे रखते हैं। पर इस श्लोक का सबसे मार्मिक शब्द है 'अव्ययम्', अविनाशी। जो बँधा हुआ है, वह स्वयं अविनाशी है, स्वतंत्र है, गुणों से परे है। फिर भी वह बँध जाता है। यह एक सम्राट के समान है जो भूल से स्वयं को कारागार में बन्दी मान बैठा हो, जबकि कारागार का द्वार कभी बन्द ही नहीं था। ध्यान दीजिए, भगवान यह भी कहते हैं कि सत्त्व भी बाँधता है, जो सबसे अच्छा गुण माना जाता है। अच्छाई की आसक्ति भी एक बन्धन है, सोने की बेड़ी की भाँति। यह श्लोक आपको अपने भीतर की इन तीन शक्तियों को पहचानने का आमंत्रण देता है। आज दिन भर देखिए: कब आप शान्त और स्पष्ट हैं, कब अशान्त और सक्रिय, कब सुस्त और भ्रमित। यही पहचान मुक्ति का आरम्भ है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
त्रिगुण-सिद्धांत (सत्त्व, रज और तम) मानव व्यक्तित्व और व्यवहारिक मनोविज्ञान का संपूर्णतम वर्गीकरण है: "सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥" हे महाबाहो! प्रकृति से उत्पन्न होने वाले सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को इस शरीर में बांधते हैं। आधुनिक न्यूरोसाइंस और पर्सनैलिटी साइकोलॉजी में इसे मस्तिष्क की तीन मूलभूत अवस्थाओं के रूप में देखा जा सकता है: सत्त्व = संतुलन, स्पष्टता और डोपामाइन-सेरोटोनिन का सामंजस्य; रज = अत्यधिक उत्तेजना, महत्वाकांक्षा, एड्रेनालाईन-चालित गतिशीलता और लालसा; तम = सुस्ती, जड़ता, भ्रम और अवसाद। यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ये तीनों गुण 'प्रकृति के' हैं, आत्मा के नहीं। जैसे रस्सी के तीन धागे मिलकर मनुष्य को बांधते हैं, वैसे ही ये तीनों गुण हमें देह-बंधन में डालते हैं। यहाँ तक कि सत्त्व गुण (ज्ञान और सुख का संग) भी यदि अहंकार बन जाए कि "मैं ज्ञानी हूँ", तो वह भी बंधन बन जाता है। श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि पहले तम (आलस्य और अज्ञान) को रज (कर्म और पुरुषार्थ) से जीतो; फिर रज (अत्यधिक लालसा और अशांति) को सत्त्व (ज्ञान, समता और सेवा) से जीतो; और अंततः सत्त्व के भी पार जाकर गुणातीत बनो।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **दैनिक मानसिक अवस्था का ऑडिट (Three-Guna Audit)**: दिन में एक बार अपनी मानसिक स्थिति की जांच करें—क्या आप तम (आलस्य/उदास) में हैं, रज (अति-व्यस्त/तनावग्रस्त) में हैं, या सत्त्व (शांत/स्पष्ट) में हैं? - **तम से रज की ओर प्रस्थान (Overcoming Inertia with Action)**: जब आलस्य या अवसाद घेरे, तो खाली बैठकर सोचने के बजाय तुरंत कोई शारीरिक गतिविधि, व्यायाम या छोटा सा काम शुरू करके रजोगुण को सक्रिय करें। - **रज से सत्त्व का संधान (Calming Ambition into Clarity)**: जब काम का भारी तनाव और बेचैनी हो, तो 15 मिनट मौन ध्यान, प्रकृति-भ्रमण या आध्यात्मिक पठन करके अपनी ऊर्जा को सत्त्वगुण में स्थिर करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“वर्तमान समय में आपके जीवन में किस गुण का सर्वाधिक प्रभाव है—तम की सुस्ती, रज की अंतहीन दौड़, अथवा सत्त्व का शांत प्रकाश? क्या आप इनके पार जाने के लिए तैयार हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सर्केडियन जीवविज्ञान और तंत्रिका-मनोविज्ञान: मानव मस्तिष्क भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में कार्य करता है — सजग/स्पष्ट (सत्त्व-प्रधान), उत्तेजित/तनावग्रस्त (रजस-प्रधान), और सुस्त/धुंधला (तमस-प्रधान)। आहार, नींद, व्यायाम और वातावरण मस्तिष्क को इन अवस्थाओं के बीच मापने योग्य रूप से स्थानांतरित करते हैं। गीता का त्रिगुण-मॉडल उसी का प्राचीन अनुभवजन्य मानचित्र है जिसे तंत्रिका-विज्ञान अब शारीरिक रूप से मापता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

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  • Translation · from the source archive

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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ये दर्ज संबंध हैं। अपने आप सुझाए हुए पाठ नहीं।

आगे क्या · What next