श्रीमद्भगवद्गीता

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Bhagavad Gita 14.17

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

सत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

From Sattva arises knowledge, from Rajas arises greed, from Tamas arises negligence and delusion, and from it arises ignorance.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

भगवान अब बताते हैं कि तीनों गुणों से मन में क्या उत्पन्न होता है, और यह श्लोक मनुष्य के भीतर के संसार का एक स्पष्ट मानचित्र है। 'सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानम्', सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, 'रजसो लोभ एव च', रजोगुण से लोभ, 'प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च', और तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान। पिछले श्लोक में कर्मों के फल की बात थी; इस श्लोक में मन की अवस्थाओं की। सत्त्व से 'ज्ञान', अर्थात् स्पष्टता, विवेक, उचित-अनुचित की पहचान। रज से 'लोभ', अर्थात् और अधिक पाने की निरन्तर इच्छा। और तम से तीन: 'प्रमाद', असावधानी; 'मोह', भ्रम; और 'अज्ञान', अन्धकार। ध्यान दीजिए कि तमोगुण के तीन फल गिनाए गए हैं, जबकि सत्त्व और रज का एक-एक। यह संकेत है कि तम का प्रभाव सबसे गहरा और सबसे बहुमुखी है। वह मन को कई प्रकार से जकड़ लेता है। और इसका उपचार भी स्पष्ट है: ज्ञान, जो सत्त्व से आता है। जैसे अन्धकार को हटाने के लिए उससे लड़ना नहीं पड़ता, केवल दीपक जलाना पड़ता है। यह श्लोक आपको अपने विचारों की जड़ तक जाना सिखाता है। जब मन में लोभ उठे, तो पहचानिए कि रज बोल रहा है। जब भ्रम छाए, तो पहचानिए कि तम है। और जब स्पष्टता आए, तो जानिए कि सत्त्व का दीपक जल रहा है। उसी दीपक को बार-बार जलाइए।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
त्रिगुणों के स्वाभाविक परिणामों पर श्रीकृष्ण का यह सूत्र कार्य-कारण नियम का सटीक निरूपण है: "सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥" सत्त्वगुण से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है; रजोगुण से लोभ (अतृप्त लालसा) उत्पन्न होता है; और तमोगुण से प्रमाद (लापरवाही), मोह (भ्रम) और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। आधुनिक 'संज्ञानात्मक पोषण' (Cognitive Diet / Information Diet) का नियम यही कहता है कि आप जैसा संवेदी इनपुट और जीवनशैली अपनाते हैं, आपकी मानसिक स्पष्टता उसी के अनुसार निर्मित होती है। यदि आप सोशल मीडिया पर दिन भर सनसनीखेज खबरें, घृणा और विवाद देखते हैं, तो आपके भीतर रजोगुण और लोभ बढ़ेगा—मन कभी शांत नहीं होगा। यदि आप अत्यधिक मादक पदार्थ, बासी भोजन और आलस्यपूर्ण जीवन जीते हैं, तो मस्तिष्क में तमोगुण छा जाएगा, जिससे निर्णय लेने की क्षमता कुंद हो जाएगी। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान कोई आकस्मिक घटना नहीं है; यह सत्त्वगुण की खेती का स्वाभाविक फल है। जब आप अपने भोजन, संगति, विचारों और वातावरण को सात्विक बनाते हैं, तो ज्ञान और विवेक स्वतः प्रस्फुटित होते हैं।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सात्विक सूचना-आहार का वरण (Curating Your Mental Diet)**: सोशल मीडिया पर व्यर्थ के विवादों, नकारात्मक समाचारों और वासना-प्रेरक सामग्री से दूर रहें; अपनी बुद्धि को उच्च विचारों और ज्ञानवर्धक ग्रंथों का आहार दें। - **लोभ और अतृप्ति की पहचान (Checking Restless Greed)**: जब मन में 'और चाहिए, और चाहिए' की अंधी दौड़ शुरू हो, तो पहचानें कि यह रजोगुण का हमला है; तुरंत रुकें और कृतज्ञता का अभ्यास करें। - **लापरवाही और आलस्य का उन्मूलन (Eliminating Pramada)**: आवश्यक कार्यों में टालमटोल या असावधानी को तमोगुण का लक्षण मानकर तुरंत सक्रिय हों; अपनी आदतों में अनुशासन स्थापित करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आपकी दैनिक जीवनशैली और सूचनाओं का उपभोग आपके भीतर सत्त्वगुण का प्रकाश बढ़ा रहा है, अथवा रजोगुण के लोभ और तमोगुण के अंधकार को गहरा कर रहा है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

संज्ञानात्मक तंत्रिका-विज्ञान पुष्टि करता है: उच्च-स्पष्टता अवस्थाओं में (alpha/theta तरंगों, विश्रांत प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स से सम्बद्ध) अंतर्दृष्टि और अधिगम अधिकतम होते हैं। उच्च-उत्तेजना अवस्थाओं में (उच्च cortisol, सहानुभूतिक सक्रियता) ध्यान तत्काल पुरस्कार-खोज तक सिमट जाता है (रजस = लोभ)। निम्न-ऊर्जा अवस्थाओं में संज्ञानात्मक कार्य भ्रम और जड़ता में बिखर जाता है (तमस)।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

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  • Translation · from the source archive

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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ये दर्ज संबंध हैं। अपने आप सुझाए हुए पाठ नहीं।

आगे क्या · What next