मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते
mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāri-pakṣhayoḥ sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa uchyate
honor
dishonor
equal
equal
friend
foe
to the parties
all
enterprises
renouncer
risen above the three modes of material nature
they
are said to have
अर्थMeaning
जो धीर मनुष्य सुख-दुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रिय-अप्रियमें तथा अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है जो मान-अपमानमें तथा मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है; जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
He who is the same in honor and dishonor, and the same to friend and foe, and who has abandoned all enterprises—he is said to have risen above the Gunas.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
गुणातीत के लक्षणों का यह वर्णन यहाँ पूरा होता है, और अन्त में भगवान उसे उसका नाम देते हैं। 'मानापमानयोस्तुल्यः', जो मान और अपमान में तुल्य है, 'तुल्यो मित्रारिपक्षयोः', जो मित्र और शत्रु के पक्ष में तुल्य है, 'सर्वारम्भपरित्यागी', जो सब नए आरम्भों का त्यागी है, 'गुणातीतः स उच्यते', वह गुणातीत कहा जाता है। 'मानापमानयोः', मान और अपमान, ये दोनों मनुष्य के अहंकार की सबसे कोमल नसें हैं। प्रशंसा मिलने पर हम फूल जाते हैं, अपमान होने पर टूट जाते हैं। पर गुणातीत दोनों में एक-सा रहता है, क्योंकि वह जानता है कि मान और अपमान दूसरों की दृष्टि हैं, उसका स्वरूप नहीं। जैसे सूर्य की कोई प्रशंसा करे या निन्दा, सूर्य वैसे ही चमकता रहता है। 'तुल्यो मित्रारिपक्षयोः', मित्र और शत्रु के पक्ष में तुल्य, यह लक्षण बताता है कि उसके हृदय में पक्षपात नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अन्याय और न्याय में भेद नहीं करता; इसका अर्थ है कि उसके मन में किसी के प्रति राग या द्वेष नहीं। और 'सर्वारम्भपरित्यागी', अपनी कामनाओं के लिए नए-नए उपक्रम न रचनेवाला, यह बताता है कि वह रजोगुण की दौड़ से मुक्त है। ये सब लक्षण दूसरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ और बारहवें अध्याय के प्रिय भक्त से मिलते हैं, जो बताता है कि ज्ञानी, भक्त और गुणातीत अन्ततः एक ही अवस्था के नाम हैं। यह श्लोक आपको एक लक्ष्य देता है। इन लक्षणों को एक-एक करके अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न कीजिए।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-23
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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