श्रीमद्भगवद्गीता

Gunatraya Vibhaga Yogaश्लोक 26/2796%

Bhagavad Gita 14.26

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

And he who, with unwavering devotion through Yoga, serves Me, he, transcending the Gunas, becomes fit for the state of Brahman.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन के तीसरे प्रश्न, 'गुणों का अतिक्रमण कैसे हो', का उत्तर भगवान अब देते हैं, और यह उत्तर अत्यन्त मधुर और सरल है। 'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते', जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, 'स गुणान्समतीत्यैतान्', वह इन गुणों का भली-भाँति अतिक्रमण करके, 'ब्रह्मभूयाय कल्पते', ब्रह्म की प्राप्ति के योग्य हो जाता है। सोचिए, पूरे अध्याय में गुणों का इतना गहरा, सूक्ष्म विवेचन हुआ: उनकी उत्पत्ति, उनके बन्धन, उनके लक्षण, उनके फल। कोई सोच सकता था कि इनसे पार जाने के लिए कोई अत्यन्त कठिन साधना चाहिए होगी। पर भगवान का उत्तर एक शब्द में है: 'भक्तियोग'। प्रेम से भगवान की सेवा। 'अव्यभिचारेण', अव्यभिचारी, अर्थात् ऐसी भक्ति जो कभी भटके नहीं, जिसमें कोई दूसरा लक्ष्य न हो। यह इस उत्तर की कुंजी है। जब मन सर्वथा भगवान में लग जाता है, तो गुणों के लिए स्थान ही नहीं बचता। जैसे जब सूर्य उदय होता है, तो अन्धकार को हटाने के लिए अलग से कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। भक्ति वह सूर्य है जो गुणों के अन्धकार को अपने-आप दूर कर देती है। ज्ञानी गुणों को देखकर उनसे अलग होता है; भक्त भगवान में डूबकर उनसे ऊपर उठ जाता है। दोनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं। यह श्लोक आपको सबसे सुगम मार्ग दिखाता है। यदि गुणों का विश्लेषण आपको कठिन लगे, तो केवल भगवान से प्रेम कीजिए। वह प्रेम ही आपको गुणों से परे ले जाएगा।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
तीनों गुणों के पार जाकर 'गुणातीत' बनने का यह सबसे प्रत्यक्ष और सुरक्षित राजमार्ग है: "मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥" जो पुरुष अव्यभिचारी (अनन्य, निष्काम और अडिग) भक्तियोग के द्वारा निरंतर मेरी सेवा और ध्यान करता है, वह इन तीनों गुणों को भली-भांति पार करके ब्रह्म-भाव (परम आत्म-साक्षात्कार) को प्राप्त होने के योग्य बन जाता है। आधुनिक व्यवहार मनोविज्ञान में इसे 'सर्वोच्च आत्म-समर्पण' (Higher-Order Goal Devotion) कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति केवल अपनी इच्छाशक्ति (Willpower) के बल पर अपने स्वभाव, आलस्य या लोभ से लड़ने का प्रयास करता है, तो वह अक्सर थककर हार जाता है; क्योंकि इच्छाशक्ति स्वयं प्रकृति के गुणों का ही एक सीमित अंश है। किंतु जब वह किसी असीम, परम दिव्य सत्ता के प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति में डूब जाता है, तो उसके सारे क्षुद्र विकार स्वतः जलकर भस्म हो जाते हैं। जैसे सूर्य के उदय होते ही कोहरा छंट जाता है, वैसे ही अनन्य भक्तियोग के प्रकाश में सत्त्व, रज और तम के समस्त बंधन विलीन हो जाते हैं और साधक अपनी शाश्वत ब्रह्म-चेतना में प्रतिष्ठित हो जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **अनन्य निष्ठा का संकल्प (Unyielding Single-Pointed Devotion)**: अपने आध्यात्मिक मार्ग या सर्वोच्च आदर्श के प्रति अडिग रहें; सांसारिक लाभ या तात्कालिक आकर्षणों के लिए अपनी निष्ठा से समझौता न करें। - **समर्पण द्वारा मुक्ति (Transcendence through Love)**: जब अपनी किसी पुरानी आदत या मानसिक कमजोरी से लड़ना असंभव लगे, तो अपनी उस विवशता को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दें और उसकी कृपा पर भरोसा रखें। - **गुणों से अप्रभावित साक्षी भाव (Resting as the Transcendent)**: जब मन में क्रोध (रज), सुस्ती (तम) या सुख (सत्त्व) की लहरें उठें, तो याद रखें कि आप इन तीनों गुणों के स्वामी ब्रह्म हैं; लहरों के साक्षी बने रहें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपनी सीमित इच्छाशक्ति के बल पर मन की वृत्तियों से लड़ते-लड़ते थक चुके हैं, अथवा अनन्य भक्तियोग के द्वारा इन तीनों गुणों के पार छलांग लगाने को तैयार हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

Self-Determination Theory (Deci & Ryan): आंतरिक प्रेरणा (शुद्ध इच्छा से, अपने लिए कर्म करना) बाह्य प्रेरणा (पुरस्कार/भय के लिए कर्म) से सर्वथा भिन्न तंत्रिकीय और मनोवैज्ञानिक परिणाम देती है। गीता जिस "भक्ति" का वर्णन करती है वह आंतरिक प्रेरणा का शुद्धतम रूप है — दिव्य के प्रेम से कर्म, व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 14.26Current VerseChandogyChandogya Upanis…TaittiriTaittiriya Upani…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Chandogya Upanishad 3.14.1

Chandogya Upanishad (छान्दोग्योपनिषद्)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

सर्वं खल्विदं ब्रह्म

Translation / Meaning (भावार्थ)

All this is verily Brahman. Everything emerges from, is sustained by, and dissolves into Brahman.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next