श्रीमद्भगवद्गीता

Arjuna Visada Yogaश्लोक 39/4783%

Bhagavad Gita 1.39

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 38–39) यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें?

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Why should we not learn to shun this crime—we who see the evil of ruining a clan, O Krishna?

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन का तर्क यहाँ पूरा होता है, और वह एक प्रश्न के रूप में आता है। 'कथं न ज्ञेयमस्माभिः', हम लोगों को यह क्यों नहीं जानना चाहिए, 'पापादस्मान्निवर्तितुम्', कि इस पाप से हमें निवृत्त होना चाहिए, 'कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन', हे जनार्दन, जब हम कुल के नाश से होनेवाले दोष को भली-भाँति देख रहे हैं? अर्जुन का तर्क अब स्पष्ट है: यदि कौरव लोभ के कारण अन्धे हैं, तो क्या हमें भी उनके साथ अन्धा हो जाना चाहिए? हम तो देख रहे हैं कि यह युद्ध कुल का विनाश करेगा। तो फिर जानते हुए हम यह पाप क्यों करें? यह एक बहुत सशक्त नैतिक तर्क है, और इसमें एक सच्चाई है: जिसे अधिक ज्ञान है, उसका उत्तरदायित्व भी अधिक है। 'प्रपश्यद्भिः', भली-भाँति देखनेवाले, यह शब्द अर्जुन के आत्मविश्वास को प्रकट करता है। उसे लगता है कि वह स्थिति को भली-भाँति देख रहा है। पर गीता का पूरा उपदेश यही दिखाएगा कि अर्जुन वास्तव में स्थिति का केवल एक पक्ष देख रहा है: कुल का नाश। वह यह नहीं देख रहा कि अधर्म को रोकना भी एक धर्म है, और उसे न रोकना भी एक पाप होगा। यह श्लोक आपको एक विनम्रता सिखाता है। जब आपको लगे कि आप किसी स्थिति को भली-भाँति देख रहे हैं, तब भी यह सम्भावना खुली रखिए कि कोई और पक्ष आपकी दृष्टि से छूट रहा हो। गुरु और शास्त्र से पूछना इसीलिए आवश्यक है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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