श्रीमद्भगवद्गीता

Arjuna Visada Yogaश्लोक 26/4755%

Bhagavad Gita 1.26

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृ़नथ पितामहान्।आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ़न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उसके बाद पृथानन्दन अर्जुनने उन दोनों ही सेनाओंमें स्थित पिताओंको, पितामहोंको, आचार्योंको, मामाओंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको तथा मित्रोंको, ससुरोंको और सुहृदोंको भी देखा।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Then, as Arjuna looked on, he saw standing there fathers, grandfathers, teachers, uncles, brothers, sons, grandsons, and comrades.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

भगवान के 'पश्य', देखो, कहने पर अर्जुन देखता है, और जो वह देखता है, वह उसका पूरा संसार है। यह दृश्य अगले श्लोक में पूरा होता है। 'तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः', वहाँ पार्थ ने खड़े हुए देखा, 'पितॄनथ पितामहान्', पिताओं को, पितामहों को, 'आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्', आचार्यों को, मामाओं को, भाइयों को, 'पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा', पुत्रों को, पौत्रों को और मित्रों को। कल्पना कीजिए उस क्षण की। अर्जुन ने एक योद्धा की भाँति शत्रुओं को देखने के लिए दृष्टि उठाई थी। पर जैसे ही उसकी आँखें उस सेना पर पड़ीं, वहाँ उसे कोई शत्रु नहीं दिखा। उसे दिखे अपने पितामह भीष्म, जिनकी गोद में वह बचपन में खेला था। अपने गुरु द्रोणाचार्य, जिन्होंने उसे धनुष चलाना सिखाया था। अपने भाई, अपने पुत्र, अपने मित्र। इस श्लोक में सम्बन्धों की यह लम्बी सूची अपने-आप में एक करुण कविता है। हर शब्द एक अलग सम्बन्ध है, और हर सम्बन्ध के साथ अनगिनत स्मृतियाँ जुड़ी हैं। पिता की छाया, पितामह का स्नेह, गुरु का आशीर्वाद, भाइयों के साथ खेले खेल, मित्रों के साथ बिताए दिन। 'अपश्यत्', उसने देखा, यह एक शब्द इस पूरे अध्याय का मोड़ है। अब तक अर्जुन ने एक सेना देखी थी; अब उसने अपना परिवार देखा। यह श्लोक आपको एक गहरा सत्य दिखाता है: जब हम किसी को 'शत्रु' के रूप में देखते हैं, तो उसे मारना सरल लगता है। पर जब हम उसे एक मनुष्य, किसी के पिता, किसी के पुत्र के रूप में देखते हैं, तो सब कुछ बदल जाता है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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