श्रीमद्भगवद्गीता

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Bhagavad Gita 1.23

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

दुष्टबुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छावाले जो ये राजालोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए इन सबको मैं देख लूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

I wish to see those gathered here ready to fight in this battle in order to please the evil-minded son of Dhrtarashtra.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन अपनी इच्छा का कारण और स्पष्ट करता है, और इसमें उसके मन में दुर्योधन के प्रति एक तीखा भाव झलकता है। 'योत्स्यमानानवेक्षेऽहम्', युद्ध करनेवालों को मैं देखूँ, 'य एतेऽत्र समागताः', जो ये यहाँ इकट्ठे हुए हैं, 'धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेः', दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र का, 'युद्धे प्रियचिकीर्षवः', युद्ध में प्रिय करने की इच्छावाले। 'दुर्बुद्धेः', दुर्बुद्धि, अर्जुन दुर्योधन को इसी शब्द से सम्बोधित करता है। यह शब्द कठोर है, पर इसके पीछे वर्षों का अनुभव है: लाक्षागृह में जलाने का षड्यन्त्र, द्यूतसभा का कपट, द्रौपदी का अपमान, तेरह वर्षों का वनवास, और अन्त में पाँच गाँव भी देने से मना कर देना। अर्जुन के इस शब्द में एक गहरा, संचित आक्रोश है। पर इस श्लोक का दूसरा भाग भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है: 'प्रियचिकीर्षवः', प्रिय करने की इच्छावाले। अर्जुन जानना चाहता है कि कौन-कौन से राजा दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए इस युद्ध में आए हैं। यह प्रश्न एक गम्भीर सत्य की ओर संकेत करता है: बहुत से लोग अधर्म के पक्ष में इसलिए खड़े होते हैं कि वे किसी शक्तिशाली व्यक्ति को प्रसन्न करना चाहते हैं, उनसे कुछ पाना चाहते हैं, या उनसे डरते हैं। अर्जुन अभी भी एक योद्धा की दृष्टि से सोच रहा है, शत्रु और मित्र के स्पष्ट भेद में। यह श्लोक आपको एक प्रश्न देता है: क्या आप कभी किसी को प्रसन्न करने के लिए किसी अनुचित पक्ष में खड़े हुए हैं? धर्म किसी को प्रसन्न करने से बड़ा है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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