श्रीमद्भगवद्गीता

Arjuna Visada Yogaश्लोक 28/4760%

Bhagavad Gita 1.28

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अर्जुन उवाचकृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 28–30) अर्जुन बोले - हे कृष्ण! युद्ध की इच्छावाले इस कुटुम्ब-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी आ रही है एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं। हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He was filled with deep compassion and said these words in despair:

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अब अर्जुन बोलता है, और उसके शब्दों में एक टूटे हुए हृदय की पीड़ा है। यह वर्णन तीन श्लोकों तक चलता है। 'कृपया परयाऽऽविष्टः', अत्यन्त करुणा से भरकर, 'विषीदन्निदमब्रवीत्', विषाद करते हुए उसने यह कहा: 'दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण', हे कृष्ण, इन स्वजनों को, 'युयुत्सुं समुपस्थितम्', युद्ध की इच्छा से सामने उपस्थित देखकर। 'कृपया परयाऽऽविष्टः', अत्यन्त करुणा से आविष्ट, यह शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण है। अर्जुन की यह अवस्था क्रूरता या भय से नहीं, करुणा से उत्पन्न हुई है। वह एक कोमल हृदयवाला व्यक्ति है, जो अपने प्रियजनों को मारने की कल्पना से ही काँप उठता है। पर भगवान आगे इस करुणा को 'कश्मल', मोह, कहेंगे। क्यों? क्योंकि यह करुणा विवेक से नहीं, ममता से उपजी है। सच्ची करुणा कर्तव्य से नहीं भागती। 'स्वजनम्', अपने लोग, यह शब्द इस श्लोक का हृदय है। अर्जुन अब उन्हें 'धार्तराष्ट्र' या 'शत्रु' नहीं कहता। अब वे 'स्वजन' हैं, अपने लोग। जिस क्षण शत्रु 'अपना' बन जाता है, उस क्षण युद्ध असम्भव लगने लगता है। और 'विषीदन्', विषाद करते हुए, इसी शब्द से इस अध्याय का नाम पड़ा है: 'अर्जुनविषादयोग'। यह विषाद ही गीता के उपदेश का द्वार है। यह श्लोक आपको बताता है कि करुणा एक सुन्दर गुण है, पर जब वह विवेक से अलग हो जाए, तो वह मोह बन सकती है। अपनी करुणा को सदा विवेक के प्रकाश में परखिए।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
अपनों को युद्धक्षेत्र में सामने देखकर अर्जुन के शरीर में जो लक्षण प्रकट हुए—अंगों का कांपना, मुख का सूखना, शरीर में रोमांच और गांडीव का हाथ से फिसलना—वे आधुनिक न्यूरोबायोलॉजी में 'तीव्र तनाव प्रतिक्रिया' (Acute Stress Response / Fight-Flight-Freeze) के सर्वथा सटीक लक्षण हैं। जब व्यक्ति के भीतर दो गहरे मूल्यों—जैसे पारिवारिक मोह और क्षत्रिय कर्तव्य—के बीच भीषण अंतर्द्वंद्व छिड़ता है, तो स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System) अत्यधिक उत्तेजित हो जाता है, जिससे शारीरिक नियंत्रण डगमगाने लगता है। अर्जुन विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था, फिर भी वह इस शारीरिक-मानसिक पक्षाघात से अछूता नहीं रहा। यह दर्शाता है कि तनाव या घबराहट कोई व्यक्तिगत विफलता या दुर्बलता नहीं है, बल्कि गहन भावनात्मक द्वंद्व के प्रति एक स्वाभाविक जैविक प्रतिक्रिया है। आधुनिक जीवन में भी जब लोग बर्नआउट, पैनिक अटैक या अत्यधिक भावनात्मक आघात का शिकार होते हैं, तो वे अपनी भावनाओं को दबाने का प्रयास करते हैं। गीता का यह प्रसंग सिखाता है कि घबराहट से भागने के स्थान पर उसके अंतर्निहित कारण को समझना ही मुक्ति का पहला कदम है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **शारीरिक संकेतों की पहचान (Somatic Awareness)**: जब भी किसी कठिन परिस्थिति में दिल की धड़कन तेज हो, हाथ कांपें या मुंह सूखे, तो तुरंत स्वयं को दोषी न ठहराएं; स्वीकार करें कि यह आपके तंत्रिका तंत्र की एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया है। - **द्वंद्व का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण (Naming the Core Conflict)**: अपनी घबराहट के पीछे छिपे वास्तविक अंतर्द्वंद्व को कागज़ पर लिखें—जैसे 'क्या मैं असफलता से डर रहा हूँ या दूसरों की अस्वीकृति से?'—ताकि भ्रम दूर हो सके। - **प्राण-आधारित शांति (Vagal Breathing Reset)**: घबराहट के क्षण में 4 सेकंड गहरी सांस लें और 6 से 8 सेकंड में धीमी गति से सांस छोड़ें; यह शारीरिक उत्तेजना को शांत कर विवेक को पुनः जागृत करता है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपनी घबराहट और शारीरिक तनाव को अपनी कमजोरी मानकर उससे भागने की कोशिश करते हैं, अथवा उसके मूल में छिपे भावनात्मक द्वंद्व को समझने का धैर्य रखते हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

अर्जुन के लक्षण — कंपन, शुष्क मुख, शरीर का शिथिल पड़ना — Acute Stress Response के क्लासिक संकेत हैं। Cortisol और Adrenaline का अचानक स्राव होता है जब मस्तिष्क किसी परिचित व्यक्ति को "शत्रु" की श्रेणी में रखने को बाध्य होता है — यही Cognitive Dissonance है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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