श्रीमद्भगवद्गीता

Arjuna Visada Yogaश्लोक 17/4736%

Bhagavad Gita 1.17

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 17–18) हे राजन्! श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओंवाले सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु - इन सभी ने सब ओर से अलग-अलग (अपने-अपने) शंख बजाये।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

And the King of Kasi, the supreme bowman, Sikandi the mighty warrior, Dhrstadyumna, and Virata; and Satyaki, the invincible;

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

पाण्डव-सेना के अन्य महारथी भी अब अपने शंख बजाते हैं, और यह वर्णन अगले श्लोक में पूरा होता है। 'काश्यश्च परमेष्वासः', श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज, 'शिखण्डी च महारथः', महारथी शिखण्डी, 'धृष्टद्युम्नो विराटश्च', धृष्टद्युम्न और राजा विराट, 'सात्यकिश्चापराजितः', और अजेय सात्यकि। इस सूची में दो नाम विशेष अर्थ रखते हैं। 'शिखण्डी', जो इस युद्ध में भीष्म के पतन का कारण बनेगा। पिछले श्लोकों में दुर्योधन ने अपनी सेना को भीष्म की रक्षा करने को कहा था, और यहाँ, पाण्डव-पक्ष में, वही व्यक्ति शंख बजा रहा है जिसके सामने भीष्म शस्त्र नहीं उठाएँगे। संजय जानते हैं कि क्या होनेवाला है, और यह नाम एक मौन संकेत है। दूसरा नाम है 'धृष्टद्युम्न', द्रुपद का वह पुत्र जो द्रोणाचार्य के वध के लिए यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न हुआ था, और जो पाण्डव-सेना का सेनापति है। और 'सात्यकिः अपराजितः', सात्यकि, जिसे कभी पराजित नहीं किया जा सका। संजय इन नामों को गिनाते हुए धृतराष्ट्र के सामने एक चित्र रख रहे हैं: पाण्डवों के पक्ष में ऐसे वीर हैं जिनका भाग्य कौरवों के प्रमुख योद्धाओं से जुड़ा है। यह श्लोक एक गहरा सत्य दिखाता है: हर कर्म का फल अपने समय पर प्रकट होता है। जो बीज वर्षों पहले बोए गए थे, द्रोण और द्रुपद का वैर, भीष्म और अम्बा की कथा, वे सब इस युद्धभूमि में फल बनकर खड़े हैं। आज जो बीज आप बो रहे हैं, उनके प्रति सावधान रहिए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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