श्रीमद्भगवद्गीता

Arjuna Visada Yogaश्लोक 35/4774%

Bhagavad Gita 1.35

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 34–35) (टिप्पणी प0 24.1) आचार्य, पिता, पुत्र और उसी प्रकार पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं, मुझपर प्रहार करने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, और हे मधुसूदन! मुझे त्रिलोकी का राज्य मिलता हो, तो भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वीके लिये तो (मैं इनको मारूँ ही) क्या?

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

I would not slay them, even if they might slay me, for the sovereignty of the three worlds—how much less for this earth, O Krsna?

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अर्जुन अपने निर्णय को एक दृढ़ प्रतिज्ञा के रूप में कहता है, और इसमें उसके हृदय का पूरा प्रेम और पूरी पीड़ा एक साथ है। 'एतान्न हन्तुमिच्छामि', मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, 'घ्नतोऽपि मधुसूदन', हे मधुसूदन, चाहे ये मुझे मार भी डालें; 'अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः', तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, 'किं नु महीकृते', फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या। 'घ्नतोऽपि', मुझे मारते हुए भी, यह शब्द अर्जुन के हृदय की उदारता का सबसे बड़ा प्रमाण है। वह कह रहा है कि यदि ये लोग मुझ पर प्रहार करें, मुझे मार डालें, तब भी मैं इन पर हाथ नहीं उठाऊँगा। यह एक असाधारण त्याग है, जो किसी साधारण मन में नहीं उठ सकता। फिर अर्जुन एक तुलना करता है: 'त्रैलोक्यराज्यस्य', तीनों लोकों का राज्य। यदि स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल, तीनों का राज्य भी मिले, तब भी मैं इन्हें नहीं मारूँगा। और 'महीकृते', केवल इस पृथ्वी के लिए, तो प्रश्न ही नहीं उठता। अर्जुन को यह राज्य अपनों के रक्त के सामने तुच्छ लगता है। उसका यह भाव सुन्दर है, सच्चा है, हृदय से उपजा है। फिर भी, भगवान आगे बताएँगे कि यह भाव धर्म के बोध पर नहीं, मोह पर टिका है। प्रश्न केवल यह नहीं कि मैं क्या चाहता हूँ, बल्कि यह भी कि मेरा कर्तव्य क्या है। यह श्लोक आपको सिखाता है कि अपने हृदय की कोमलता का आदर कीजिए, पर निर्णय लेते समय यह भी पूछिए: मेरा धर्म क्या कहता है?

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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