श्रीमद्भगवद्गीता

Arjuna Visada Yogaश्लोक 20/4743%

Bhagavad Gita 1.20

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे महीपते! धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Then Arjuna, whose banner crest was Hanuman, on beholding the sons of Dhrtarastra arrayed, took up his bow, while missiles were beginning to fly.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अब संजय कथा के केन्द्र की ओर मुड़ते हैं: अर्जुन। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है। 'अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः', तब व्यवस्थित रूप से खड़े धृतराष्ट्र-पक्ष के लोगों को देखकर कपिध्वज अर्जुन ने, 'प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते', जब शस्त्र चलने की तैयारी हो रही थी, 'धनुरुद्यम्य पाण्डवः', पाण्डुपुत्र ने अपना धनुष उठा लिया। 'कपिध्वजः', जिसकी ध्वजा पर कपि, अर्थात् हनुमान जी, विराजमान हैं, यह विशेषण इस क्षण को एक दिव्य आभा देता है। परम्परा के अनुसार हनुमान जी ने भीम को वचन दिया था कि वे अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठकर पाण्डवों की रक्षा करेंगे। जिस रथ के सारथी स्वयं भगवान हों और ध्वजा पर उनके परम भक्त, उस रथ पर बैठा योद्धा कैसे हार सकता है? और 'धनुरुद्यम्य', धनुष उठाकर, यह इस क्षण का सबसे महत्त्वपूर्ण चित्र है। अर्जुन युद्ध के लिए सर्वथा तैयार है। उसके हाथ में गाण्डीव है, उसके मन में उत्साह है, वह शत्रुओं को देख रहा है। यह वह क्षण है जिसके ठीक बाद सब कुछ बदल जाएगा। जो धनुष अभी उठा है, वह कुछ ही क्षणों में उसके हाथ से गिर जाएगा। गीता का पूरा उपदेश इसी एक परिवर्तन के कारण दिया गया। यह श्लोक आपको जीवन की अनिश्चितता का स्मरण कराता है। हम जिस क्षण स्वयं को सबसे अधिक तैयार और दृढ़ मानते हैं, उसी क्षण कोई अनपेक्षित भाव हमें हिला सकता है। ऐसे क्षणों के लिए भगवान को अपना सारथी बनाकर रखिए।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब अर्जुन ने कपिध्वज (हनुमान जी के ध्वज) वाले रथ पर बैठकर धनुष उठाया, तो यह केवल एक भौतिक अस्त्र का संधान नहीं था, बल्कि आत्म-स्मरण और उद्देश्य के प्रति निष्ठा का प्रतीक था। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे 'प्रतीकात्मक आत्म-पूर्णता सिद्धांत' (Symbolic Self-Completion Theory - Wicklund & Gollwitzer) कहा जाता है। जब मनुष्य किसी अत्यंत कठिन, अनिश्चित या भयावह परिस्थिति का सामना करता है, तो उसके पास ऐसे मूर्त प्रतीक, मूल्य या आदर्श होने चाहिए जो संकट के क्षण में उसे उसकी वास्तविक पहचान और उच्चतर उद्देश्य का स्मरण करा सकें। कार्यस्थल, नेतृत्व और व्यक्तिगत जीवन में जब भी भारी दबाव, असफलता या नैतिक असमंजस की स्थिति आती है, तो मानसिक भटकाव स्वाभाविक है। अर्जुन का कपिध्वज रथ यह सिखाता है कि युद्ध आरंभ होने से पहले हमें अपने आंतरिक 'एंकर' (मनोवैज्ञानिक लंगर) को स्थापित कर लेना चाहिए। जब आपका ध्यान अपने सर्वोच्च आदर्श—चाहे वह सत्यनिष्ठा हो, सेवा हो या कर्तव्य—से बंधा रहता है, तो बाह्य चुनौतियाँ आपकी इच्छाशक्ति को डिगा नहीं पातीं।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **आंतरिक लंगर की स्थापना (Psychological Anchoring)**: अपने कार्यस्थल, डेस्क या स्मार्टफोन स्क्रीन पर कोई ऐसा प्रतीक, चित्र या वाक्य रखें जो आपको कठिन क्षणों में आपके जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य का स्मरण कराए। - **रणनीतिक सचेतनता (Intentional Readiness)**: किसी भी महत्वपूर्ण बैठक, परीक्षा या कठिन बातचीत में प्रवेश करने से पहले 30 सेकंड का मौन विराम लें और धनुष उठाने वाले योद्धा की तरह अपनी मानसिक ऊर्जा को एकाग्र करें। - **अहंकार-मुक्त संकल्प (Humble Devotion to Duty)**: अपने कर्म को अपनी व्यक्तिगत विजय का साधन मानने के बजाय किसी उच्चतर आदर्श या समाज के कल्याण के प्रति समर्पित करने का भाव बनाए रखें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“जब आप जीवन की किसी भीषण चुनौती या संघर्ष के मुहाने पर खड़े होते हैं, तो क्या आपके पास ऐसा कोई अटल आदर्श या प्रतीक है जो आपके आत्म-विश्वास को स्थिर रख सके?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

मनोविज्ञान में Symbolic Self-Completion Theory (Wicklund & Gollwitzer): जब हम किसी आदर्श का प्रतीक धारण करते हैं, तो हमारा आत्मविश्वास और कार्य-क्षमता वास्तव में बढ़ जाती है। एथलीट के jersey number से लेकर सेना के badges तक — प्रतीक हमें अपने उद्देश्य से जोड़ते हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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