एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः
etāṁ dṛiṣhṭim avaṣhṭabhya naṣhṭātmāno ’lpa-buddhayaḥ prabhavanty ugra-karmāṇaḥ kṣhayāya jagato ’hitāḥ
such
views
holding
misdirected
souls
of small intellect
arise
cruel
actions
destruction
of the world
enemies
अर्थMeaning
उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Holding this view, these men of lost souls and feeble understanding do cruel deeds, leading to the destruction of the world.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
पिछले श्लोक की दृष्टि का परिणाम भगवान अब बताते हैं, और वह परिणाम भयावह है। 'एतां दृष्टिमवष्टभ्य', इस दृष्टि का आश्रय लेकर, 'नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः', जो अपने नित्य स्वरूप को भूल गए हैं और जिनकी बुद्धि तुच्छ है, 'प्रभवन्त्युग्रकर्माणः', वे उग्र कर्म करनेवाले, 'क्षयाय जगतोऽहिताः', जगत् के अहितकारी होकर उसके विनाश के लिए उत्पन्न होते हैं। 'नष्टात्मानः', जिनकी आत्मा नष्ट हो गई, यह शब्द कठोर लगता है, पर गीता प्रेस इसे 'अपने नित्य स्वरूप को न माननेवाले' के अर्थ में लेती है। आत्मा कभी नष्ट नहीं होती; पर जब मनुष्य उसे भूल जाता है, तो वह व्यावहारिक रूप से नष्ट जैसी हो जाती है। जैसे किसी के पास अमूल्य रत्न हो, पर वह उसे पत्थर समझकर फेंक दे। 'अल्पबुद्धयः', छोटी बुद्धिवाले, यह भी ध्यान देने योग्य है। यह बुद्धि की तीक्ष्णता की कमी नहीं; ऐसे लोग बहुत चतुर भी हो सकते हैं। यह बुद्धि की दृष्टि की कमी है: वह केवल अपने तात्कालिक लाभ तक देखती है, उससे आगे नहीं। और जब ऐसी बुद्धि शक्ति के साथ मिल जाती है, तो वह 'उग्रकर्म', क्रूर कर्मों में बदल जाती है, जो संसार का अहित करते हैं। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ बड़ी शक्ति बिना नैतिक दृष्टि के विनाश लेकर आई। यह श्लोक आपको सिखाता है कि अपनी बुद्धि को केवल चतुर नहीं, दूरदर्शी भी बनाइए। जो कर्म केवल आपके लाभ के लिए हो और दूसरों का अहित करे, उससे सदा दूर रहिए।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-23
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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