श्रीमद्भगवद्गीता

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Bhagavad Gita 16.18

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

वे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Depending on their egoism, power, and pride, as well as their desires and wrath, these malicious men hate Me in their own bodies and in those of others.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

आसुरी स्वभाव का सबसे गहरा दोष भगवान अब प्रकट करते हैं, और वह एक अद्भुत सत्य से जुड़ा है। 'अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः', अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेनेवाले, 'मामात्मपरदेहेषु', अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझसे, 'प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः', द्वेष करते हैं और दोष-दृष्टि रखते हैं। इस श्लोक का सबसे मार्मिक भाग है 'मामात्मपरदेहेषु', अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझसे। भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों से द्वेष करता है, वह वास्तव में उनसे द्वेष कर रहा है, क्योंकि वे हर शरीर में हैं। और जो अपने शरीर को अहंकार और क्रोध से कष्ट देता है, वह भी उन्हीं को कष्ट दे रहा है, क्योंकि वे उसके भीतर भी हैं। यह एक गहरा नैतिक सत्य है। किसी को अपमानित करना, किसी का शोषण करना, किसी से घृणा करना, यह केवल उस व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, भगवान के विरुद्ध एक कर्म है। जैसे कोई मन्दिर में जाकर भगवान को प्रणाम करे, और बाहर आकर किसी भिक्षुक का तिरस्कार करे, बिना जाने कि दोनों में वही भगवान हैं। 'अभ्यसूयकाः', दोष देखनेवाले, यह बताता है कि ऐसे लोग दूसरों के गुणों में भी दोष खोजते हैं। यह श्लोक आपको एक पवित्र दृष्टि देता है। जब किसी पर क्रोध आए, किसी से घृणा हो, तो एक क्षण रुककर स्मरण कीजिए: इस व्यक्ति के भीतर भी वही भगवान हैं जिनकी मैं पूजा करता हूँ।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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