कठोपनिषद्

Vallī 6श्लोक 4/1822%

Katha Upanishad 6.4

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः ।ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

यदि शरीर के गिरने से पहले ही यहाँ जान लिया जाये — तो ठीक; अन्यथा सर्ग-लोकों में पुनः शरीर के योग्य बना रहता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

If one is able to know him here, before the body falls away — well; otherwise one is fit for embodiment again in created worlds.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

मानव जीवन का परम अवसर: यदि इस भौतिक शरीर के गिरने (मृत्यु) से पहले ही मनुष्य उस परमात्मा को यहाँ साक्षात् जान ले — तब तो वह मुक्त हो जाता है! अन्यथा, इस सत्य को न जानने पर उसे इस सृष्टि के विभिन्न लोकों में पुनः शरीर धारण करने के लिए बाध्य होना पड़ता है!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज मानव जीवन की सबसे बड़ी तात्कालिकता (Urgency) का शंखनाद करते हैं: 'इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः। ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते॥' — यदि इस दुर्लभ मानव शरीर के नष्ट होने से पूर्व ही तुमने उस परमात्मा का यहाँ साक्षात्कार कर लिया, तब तो तुम्हारा जीवन सफल हुआ और तुम सदा के लिए मुक्त हो गए! किन्तु यदि तुमने इस अवसर को गंवा दिया और देह छूट गई, तो तुम्हें पुनः अनेक कल्पों तक नाना योनियों और लोकों में शरीर धारण करके भटकना पड़ेगा! यह श्लोक उन लोगों के भ्रम को तोड़ता है जो सोचते हैं कि "आध्यात्मिक साधना तो बुढ़ापे में करेंगे, अभी तो मौज-मस्ती का समय है।" किसे पता है कि यह देह कब गिर जाएगी? दुर्घटना, बीमारी या काल का कोई भरोसा नहीं है। मानव योनि चेतना के विकास का वह अद्वितीय जंक्शन है जहाँ से मनुष्य या तो अमरत्व की ओर छलांग लगा सकता है या पुनः अधोगति में गिर सकता है। यदि जीवित रहते हुए विवेक जाग्रत नहीं हुआ, तो मरने के बाद कोई चमत्कार नहीं होगा। आत्म-साक्षात्कार को कल पर टालना जीवन का सबसे बड़ा जुआ है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **साधना में तात्कालिकता (Sense of Urgency)**: आत्म-विकास और ध्यान को कभी 'रिटायरमेंट' के लिए न टालें; आज और अभी से अपने भीतर उतरने का संकल्प लें। - **मानव देह की अमूल्यता को पहचानें**: यह दुर्लभ अवसर केवल रोटी कमाने और मनोरंजन के लिए नहीं मिला है; इसका उपयोग अपने शाश्वत स्वरूप को पहचानने में करें। - **वर्तमान क्षण में मुक्ति**: समझें कि मुक्ति मरने के बाद नहीं मिलती; जो जीवित रहते हुए मुक्त है, वही मरने के बाद भी मुक्त रहता है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“यदि आज ही मेरे शरीर का अंतिम दिन हो, तो क्या मैंने उस सत्य को जान लिया है जिसके बिना मुझे पुनः जन्म-मरण के चक्रव्यूह में भटकना पड़ेगा?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

अवसर की तात्कालिकता और संज्ञानात्मक अवसर (Critical Period of Awakening): मानव मस्तिष्क ही एकमात्र ऐसा जटिल जैविक तंत्र है जहाँ चेतना अपने आत्म-स्वरूप को जानने में समर्थ है; यह अवसर देह छूटने से पूर्व ही सिद्ध होना चाहिए।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Katha Upanishad 6.4Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 3.35

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

Translation / Meaning (भावार्थ)

Better is one's own dharma though imperfectly performed than the dharma of another well performed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next