कठोपनिषद्

Vallī 6श्लोक 16/1889%

Katha Upanishad 6.16

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं; उनमें से एक मूर्धा (शिखर) तक जाती है। उसके द्वारा ऊर्ध्व जाने वाला अमरत्व प्राप्त करता है। अन्य नाड़ियाँ — उत्क्रमण के समय — विभिन्न दिशाओं में जाती हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

A hundred and one are the nāḍīs of the heart; one of them rises to the crown of the head. By going upward through that, one attains immortality. The others, at the time of departure, go in various directions.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

हृदय की नाड़ियां और मूर्धन्य गति: इस मनुष्य के हृदय की एक सौ एक (101) प्रधान नाड़ियां हैं; उनमें से केवल एक नाड़ी (सुषुम्ना) मस्तक के शिखर (मूर्धा/ब्रह्मरंध्र) की ओर ऊपर जाती है। मृत्यु के समय उस सुषुम्ना नाड़ी के द्वारा जो जीवात्मा ऊर्ध्वगमन करता है, वह अमरत्व (परम पद) को प्राप्त होता है; जबकि अन्य सौ नाड़ियों के द्वारा निकलने वाले जीव पुनः संसार में भटकने के लिए विभिन्न दिशाओं में चले जाते हैं!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज योग-शास्त्र और प्राण-विज्ञान के सबसे गूढ़ संरचनात्मक रहस्य का उद्घाटन करते हैं: 'शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति॥' — हमारे हृदय-कमल से 101 मुख्य नाड़ियां निकलती हैं; उनमें से केवल एक नाड़ी — जिसे 'सुषुम्ना' कहा जाता है — रीढ़ के मध्य से होती हुई मस्तक के शिखर (ब्रह्मरंध्र) तक जाती है। जो साधक अपने जीवनभर की साधना और योग-बल से अपनी प्राण-ऊर्जा को इस सुषुम्ना नाड़ी में ऊर्ध्वगामी प्रवाहित करता है, वह मृत्यु के समय मस्तक के शिखर से निकलकर परम अमरत्व को प्राप्त होता है। इसके विपरीत, जो प्राण अन्य 100 अधोगामी या बहिर्मुख नाड़ियों से निकलते हैं, वे जीव पुनः जन्म-मरण के सांसारिक भंवर में भटक जाते हैं। यह श्लोक हमें अपनी चेतना की दिशा तय करने का विज्ञान सिखाता है। हमारे जीवन की अधिकांश ऊर्जा नीचे की ओर — काम, क्रोध, भय और पेट भरने की निम्नतर प्रवृत्तियों में बहकर नष्ट हो जाती है। साधना का अर्थ है इस अधोगामी ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी (Sublimated & Upward) बनाना। जब आप स्वाध्याय, ध्यान, प्राणायाम और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, तो आपकी प्राण-ऊर्जा मूलाधार से उठकर सहस्रार की ओर प्रवाहित होने लगती है। ऊर्ध्वगामी ऊर्जा मनुष्य को मेधा, दिव्य तेज और अंततः पूर्ण मुक्ति प्रदान करती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन (Energy Sublimation)**: अपनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को वासनाओं में बहने से रोकें; प्राणायाम और एकाग्रता द्वारा उसे मस्तिष्क और हृदय के उच्चतर केंद्रों की ओर उठाएं। - **सुषुम्ना का जागरण**: प्रतिदिन ध्यान में अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें और श्वास को मूलाधार से सहस्रार तक प्रवाहित होते हुए अनुभव करें। - **ऊर्ध्वगामी जीवनशैली**: क्षुद्र, तामसिक और विलासी आदतों को त्यागकर उच्चतर लक्ष्यों, सेवा और आत्म-ज्ञान के प्रति समर्पित रहें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“मेरी प्राण-ऊर्जा किस दिशा में बह रही है — नीचे की ओर संवेदी वासनाओं में, अथवा सुषुम्ना नाड़ी के द्वारा ऊर्ध्वगामी होकर उस अमर परम पद की ओर?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

ऊर्ध्वगामी तंत्रिका ऊर्जा और सुषुम्ना (Kundalini & Vertical Neural Integration): योग विज्ञान में सुषुम्ना नाड़ी रीढ़ के मध्य से मस्तिष्क के सर्वोच्च केंद्र (मूर्धा) तक चेतना की ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी ले जाने का परम पथ है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next