श्रीमद्भगवद्गीता

Purushottama Yogaश्लोक 20/20100%

Bhagavad Gita 15.20

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन ! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) और कृतकृत्य हो जाता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Thus, O sinless one, this most mysterious doctrine has been imparted by Me. By understanding this, one will become truly wise and fulfill their duty.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

पुरुषोत्तमयोग का यह अध्याय एक ऐसे श्लोक पर समाप्त होता है जिसमें भगवान स्वयं इस ज्ञान की महिमा बताते हैं। 'इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ', हे निष्पाप, इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है; 'एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्', इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान हो जाता है, 'कृतकृत्यश्च भारत', और हे भारत, कृतकृत्य हो जाता है। इस श्लोक में भगवान इस छोटे-से अध्याय को 'शास्त्र' कहते हैं, और वह भी 'गुह्यतम', सबसे गोपनीय। बीस श्लोकों के इस अध्याय में संसार-वृक्ष का रहस्य है, जीव के भगवान का अंश होने का सत्य है, और पुरुषोत्तम का स्वरूप है। एक छोटे पात्र में पूरा समुद्र समा गया है। पर इस श्लोक का सबसे सुन्दर शब्द है 'कृतकृत्यः', जिसने करने योग्य सब कुछ कर लिया। मनुष्य का पूरा जीवन एक के बाद एक कार्यों में बीतता है: यह करना है, वह पाना है। उसके मन में सदा एक अपूर्णता बनी रहती है, कुछ और करने की, कुछ और पाने की। पर भगवान कहते हैं कि जो इस ज्ञान को समझ लेता है, उसके लिए करने को कुछ शेष नहीं रहता। उसकी यात्रा पूर्ण हो जाती है। जैसे कोई लम्बी यात्रा के बाद घर पहुँचकर विश्राम करे। 'अनघ', निष्पाप, यह सम्बोधन अर्जुन के प्रति भगवान के विश्वास को बताता है: वह इस गोपनीय ज्ञान का पात्र है। यह श्लोक आपको इस अध्याय को बार-बार पढ़ने का आमंत्रण देता है। इसके बीस श्लोकों में वह सब है जो आपको कृतकृत्य बना सकता है।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive
  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

Found a mistake?

आगे क्या · What next