श्रीमद्भगवद्गीता

Purushottama Yogaश्लोक 2/2010%

Bhagavad Gita 15.2

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उस संसारवृक्षकी गुणों-(सत्त्व, रज और तम-) के द्वारा बढ़ी हुई तथा विषयरूप कोंपलोंवाली शाखाएँ नीचे, मध्यमें और ऊपर सब जगह फैली हुई हैं। मनुष्यलोकमें कर्मोंके अनुसार बाँधनेवाले मूल भी नीचे और ऊपर (सभी लोकोंमें) व्याप्त हो रहे हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

(a) Its branches extend both above and below, nourished by the Gunas. Their shoots are sense objects. (b) And their secondary roots extend downwards, resulting in actions that bind in the world of humans.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

संसार-वृक्ष का चित्र अब और विस्तार से खुलता है, और उसकी हर शाखा, हर कोंपल में एक अर्थ है। 'अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखाः', उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं, 'गुणप्रवृद्धाः विषयप्रवालाः', जो गुणों से बढ़ी हुई हैं और विषय जिनकी कोंपलें हैं; 'अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि', और उसकी जड़ें नीचे भी फैली हुई हैं, 'कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके', जो मनुष्यलोक में कर्मों के अनुसार बाँधनेवाली हैं। 'गुणप्रवृद्धाः', गुणों से बढ़ी हुई, यह शब्द पिछले अध्याय से जुड़ता है। सत्त्व, रज और तम, ये तीनों गुण इस वृक्ष के लिए जल और खाद हैं। जितना ये गुण बढ़ते हैं, उतनी ही शाखाएँ फैलती हैं। और 'विषयप्रवालाः', विषय इसकी कोंपलें हैं: शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ये वे नई, कोमल, आकर्षक कोंपलें हैं जो मन को सबसे अधिक खींचती हैं। पर इस श्लोक की सबसे गहरी बात दूसरी पंक्ति में है। मुख्य जड़ ऊपर है, पर कुछ सहायक जड़ें नीचे भी फैली हैं, जैसे बरगद की शाखाओं से नीचे लटकती जड़ें, जो धरती में जाकर वृक्ष को और दृढ़ कर देती हैं। ये जड़ें हैं 'कर्मानुबन्धीनि', कर्मों के बन्धन। मनुष्य जो कर्म करता है, वे नई जड़ों की भाँति उसे संसार में और गहरे बाँध देते हैं। यह श्लोक आपको एक जागरूकता देता है। आपके हर कामनापूर्ण कर्म से इस वृक्ष की एक नई जड़ धरती में उतरती है। निष्काम कर्म ही वह मार्ग है जिससे नई जड़ें नहीं बनतीं।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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