श्रीमद्भगवद्गीता

Purushottama Yogaश्लोक 8/2040%

Bhagavad Gita 15.8

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Whatever body its lord acquires and from whatever body it departs, it goes on its way, taking these senses as the wind carries scents from their places.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

जीव एक शरीर से दूसरे शरीर में कैसे जाता है? भगवान इसे एक अत्यन्त कोमल उपमा से समझाते हैं। 'शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः', शरीर का स्वामी बना हुआ जीव जिस शरीर को छोड़ता है और जिस शरीर को प्राप्त होता है, 'गृहीत्वैतानि संयाति', उसमें इन मन और इन्द्रियों को लेकर जाता है, 'वायुर्गन्धानिवाशयात्', जैसे वायु पुष्प आदि के स्थान से गन्ध को लेकर जाती है। इस उपमा पर ध्यान दीजिए। जब वायु किसी फूलों के उपवन से होकर बहती है, तो वह फूलों को अपने साथ नहीं ले जाती, फूल वहीं रहते हैं। पर वह उनकी सुगन्ध ले जाती है, और जहाँ भी पहुँचती है, वहाँ वह सुगन्ध फैल जाती है। ठीक इसी प्रकार जीव जब शरीर छोड़ता है, तो शरीर यहीं रह जाता है, पर वह अपने मन और इन्द्रियों के सूक्ष्म संस्कार साथ ले जाता है। यह उपमा एक गहरी शिक्षा भी देती है। यदि वायु किसी सुगन्धित उपवन से होकर आए, तो सुगन्ध लाती है; और यदि किसी दुर्गन्धयुक्त स्थान से, तो दुर्गन्ध। जीव भी अपने साथ वही ले जाता है जो उसने जीवन भर अपने मन में भरा। शुभ विचार, प्रेम, भक्ति, ये सुगन्ध हैं; और द्वेष, लोभ, क्रोध, ये दुर्गन्ध। 'ईश्वरः', स्वामी, यह शब्द बताता है कि जीव शरीर का स्वामी है, शरीर उसका स्वामी नहीं। यह श्लोक आपसे पूछता है: जब आपकी यात्रा का समय आएगा, तो आप अपने साथ कौन-सी सुगन्ध ले जाएँगे? आज से ही अपने मन को सुगन्धित विचारों से भरिए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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