श्रीमद्भगवद्गीता

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Bhagavad Gita 15.1

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

श्री भगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

श्रीभगवान् बोले -- ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The Lord said, "They speak of an immutable Asvattha tree with its roots above and branches below; its leaves are the Vedas. He who knows it knows the Vedas."

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

पन्द्रहवाँ अध्याय, 'पुरुषोत्तमयोग', गीता के सबसे छोटे पर सबसे सारगर्भित अध्यायों में है। परम्परा में इसे भोजन से पहले पाठ करने की भी रीति है। यह एक अद्भुत चित्र से आरम्भ होता है: एक उलटा वृक्ष। 'ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्', ऊपर की ओर मूल और नीचे की ओर शाखाओंवाले जिस अश्वत्थ वृक्ष को अव्यय कहते हैं, 'छन्दांसि यस्य पर्णानि', वेद जिसके पत्ते हैं, 'यस्तं वेद स वेदवित्', उसे जो जानता है, वही वेदों को जाननेवाला है। कल्पना कीजिए एक ऐसे वृक्ष की जिसकी जड़ें आकाश में हैं और शाखाएँ धरती की ओर फैली हैं। यह संसार का चित्र है। इसका मूल ऊपर है, परमात्मा में; और इसकी शाखाएँ नीचे, संसार के अनगिनत रूपों में फैली हैं। हम शाखाओं पर रहते हैं, पत्तों और फलों में उलझे रहते हैं, और यह भूल जाते हैं कि इस वृक्ष की जड़ कहाँ है। 'अश्वत्थ', पीपल, इस नाम में एक सुन्दर अर्थ छिपा है। परम्परागत व्युत्पत्ति के अनुसार 'अश्वत्थ' का अर्थ है 'जो कल तक नहीं टिकेगा'। संसार प्रवाह रूप से अनादि है, इसलिए 'अव्यय' कहा गया; पर उसका हर रूप क्षण-क्षण बदलता है। और 'छन्दांसि पर्णानि', वेद इसके पत्ते हैं: जैसे पत्ते वृक्ष की रक्षा और शोभा करते हैं, वैसे ही वेद संसार की व्यवस्था बताते हैं। यह श्लोक आपको एक नई दृष्टि देता है। जब संसार की शाखाओं में उलझन हो, तो अपनी दृष्टि ऊपर, उसकी जड़ की ओर उठाइए।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
संसार रूपी अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का यह रूपक संपूर्ण भारतीय दर्शन का सबसे क्रांतिकारी और भव्य प्रतीक है: "ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥" आदिपुरुष परमात्मा रूपी मूल (जड़) वाला ऊपर की ओर, और संसार रूपी शाखाओं वाला नीचे की ओर फैला हुआ जो यह अविनाशी अश्वत्थ वृक्ष कहा गया है—वेद जिसके पत्ते हैं—जो इस वृक्ष को मूल सहित तत्त्व से जानता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है। आधुनिक जटिल प्रणाली सिद्धांत (Complex Systems Theory) और फ्रैक्टल ट्री (Fractal Tree Models) में संसार को इसी प्रकार एक विशाल, परस्पर जुड़ी हुई जीवित संरचना के रूप में देखा जाता है। यह वृक्ष 'ऊर्ध्वमूल' इसलिए है क्योंकि इस संसार की जड़ें भौतिक धरातल पर नहीं, बल्कि उस परम चेतना (ब्रह्म) में हैं; और इसकी शाखाएं नीचे संसार में फैली हैं। 'अश्वत्थ' का शाब्दिक अर्थ है: "अ-श्व-स्थ" (जो कल तक भी स्थिर न रहे, जो निरंतर परिवर्तनशील है)। हम संसार की डालियों, पत्तों और फलों (सांसारिक उपलब्धियों और संबंधों) में उलझ जाते हैं और उस मूल जड़ (परमात्मा) को भूल जाते हैं जिससे यह सारा पोषण आ रहा है। श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि जो व्यक्ति डालियों को पकड़ने के बजाय जड़ को पहचान लेता है, वह संसार के मायाजाल से मुक्त हो जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **मूल स्रोत का स्मरण (Connecting with the Root)**: जब भी सांसारिक संबंधों या जिम्मेदारियों की डालियों में उलझन महसूस हो, तो एक क्षण रुककर अपने मूल आधार (परम चेतना) से पुनः जुड़ें; जड़ को सींचेंगे तो शाखाएं स्वतः हरी रहेंगी। - **परिवर्तनशीलता का बोध (Living in the Impermanent World)**: याद रखें कि यह संसार 'अश्वत्थ' है—यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है; न आज की असफलता स्थायी है और न आज की सफलता; इसलिए किसी भी परिस्थिति से चिपकें नहीं। - **अनासक्ति का कुल्हाड़ा (The Axe of Non-Attachment)**: श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि इस विशाल वृक्ष को 'असंग-शस्त्र' (दृढ़ अनासक्ति के कुल्हाड़े) से काटो; सांसारिक आकर्षणों के प्रति अपनी आसक्ति को ज्ञान के विवेक से काट दें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप संसार रूपी वृक्ष की क्षणभंगुर डालियों और पत्तों को सहेजने में अपनी सारी उम्र बिता रहे हैं, अथवा उस अविनाशी मूल जड़ को जानने का प्रयास कर रहे हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

विकासवादी जीवविज्ञान जीवन को एक वृक्ष के रूप में देखता है — सभी प्रजातियाँ एक साझा मूल से शाखाबद्ध। कैऑस थ्योरी: जटिल तंत्र इस अर्थ में "top-down" हैं कि कुछ मूलभूत नियम (मूल/अपरिवर्तनीय) अपार विविधता (शाखाएँ/पत्ते) को जन्म देते हैं। गीता का उलटा वृक्ष — जहाँ अतींद्रिय मूल है और दृश्य पत्ते — यह दर्शाता है कि व्यवस्था एक उच्चतर स्रोत से कैसे प्रवाहित होती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Katha Upanishad 6.1

Katha Upanishad (कठोपनिषद्)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥

Translation / Meaning (भावार्थ)

This eternal Ashvattha tree has its roots above and branches below. That alone is the pure, that is Brahman, that alone is called immortal.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

Verbatim Cosmic Tree Symbolism: Both the Gita and Katha Upanishad use the inverted cosmic Ashvattha tree to depict the manifested universe originating from the supreme root above.

आगे क्या · What next