कठोपनिषद्

Vallī 5श्लोक 11/1573%

Katha Upanishad 5.11

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जैसे सूर्य — सब लोकों का नेत्र — चाक्षुष बाह्य दोषों से लिप्त नहीं होता, वैसे ही सब प्राणियों का एक अन्तरात्मा — लोक-दुःख से लिप्त नहीं होता — वह बाह्य है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

As the sun, the eye of the whole world, is not tainted by external defects seen by the eye — so the One inner Self of all beings is not tainted by the sorrow of the world, being beyond it.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

सूर्य की निर्लेप पवित्रता: जिस प्रकार समस्त लोकों का नेत्र रूप यह सूर्य — मनुष्यों के नेत्रों के चाक्षुष दोषों (जैसे पीलिया, मोतियाबिंद आदि) से अथवा बाहर की अपवित्र और गंदी वस्तुओं से कभी लिप्त नहीं होता — ठीक उसी प्रकार, समस्त प्राणियों का एक ही अंतरात्मा संसार के बाह्य दुखों और विकारों से कभी लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह इन सब से सर्वथा परे (अलौकिक और असंग) है!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यह श्लोक संसार के समस्त संतापों और अवसादों का अंतिम समाधान प्रस्तुत करता है: 'सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः॥' — विचार करो, आकाश में चमकता हुआ सूर्य संपूर्ण जगत का नेत्र है; वह हर वस्तु को प्रकाशित करता है। यदि किसी मनुष्य की आँख में मोतियाबिंद या पीलिया हो जाए, तो क्या सूर्य बीमार हो जाता है? नहीं! यदि सूर्य की किरणें किसी नाले या गंदगी पर पड़ें, तो क्या सूर्य की किरणें गंदी हो जाती हैं? कदापि नहीं! ठीक इसी प्रकार, समस्त प्राणियों का वह एक ही अंतरात्मा संसार के किसी भी दुख, बीमारी, शोक, असफलता या पाप से कभी भी लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह इन सभी सांसारिक दृश्यों से सर्वथा 'बाह्य' (असंग, निर्लेप और साक्षी) है! हम जीवनभर यह सोचकर रोते रहते हैं कि "मैं दुखी हूँ, मैं पापी हूँ, मैं असफल हूँ, मैं बर्बाद हो गया।" उपनिषद् कहता है कि यह तुम्हारी वैसी ही मूर्खता है जैसे कोई सूर्य की किरण यह सोचने लगे कि नाले पर पड़ने के कारण वह मैली हो गई है। दुख, रोग, असफलता और विकार केवल मन और शरीर के धरातल पर घटित होते हैं; वे संसार के दृश्य हैं। तुम्हारी आत्मा केवल उनका प्रकाशक है। जैसे दर्पण में किसी हिंसक दृश्य का प्रतिबिंब पड़ने पर दर्पण नहीं टूटता और किसी गंदे दृश्य से दर्पण मैला नहीं होता, वैसे ही तुम्हारी आत्मा संसार के किसी भी दुख से कभी कलंकित नहीं हो सकती। तुम सदा शुद्ध, बुद्ध और मुक्त हो!
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **दुखों से पूर्ण निर्लेपता**: जब जीवन में कोई भारी संकट या दुख आए, तो सूर्य की भाँति साक्षी बनें — "यह दुख मेरे मन के पर्दे पर आया है, मेरी आत्मा इस दुख से सर्वथा अछूती और पवित्र है।" - **अपराध-बोध (Guilt) का विसर्जन**: अपने अतीत की भूलों से सीखें किन्तु उनसे सदा के लिए कलंकित न मानें; समझें कि आपकी अंतरात्मा सदा निष्पाप और दिव्य है। - **अविचल शांति में स्थिति**: बाह्य परिस्थितियों की गंदगी को अपने भीतर की शांति को दूषित न करने दें; सूर्य की भाँति निर्लेप प्रकाश बिखेरते रहें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं संसार के क्षणिक दुखों और असफलताओं को अपनी आत्मा का कलंक मानकर रो रहा हूँ, अथवा मैं सूर्य के समान निर्लेप रहकर अपने विशुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

प्रकाश की अदूषित प्रकृति (Purity of Illumination): सूर्य का प्रकाश चाहे किसी पवित्र गंगाजल पर पड़े या किसी गंदे नाले पर, प्रकाश स्वयं कभी मैला नहीं होता; इसी प्रकार साक्षी चेतना सुख-दुख के दृश्यों से सदा निष्पाप और अछूती रहती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 2.20

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः

Translation / Meaning (भावार्थ)

The Self is never born and never dies. Unborn, eternal, ever-existing, it is not destroyed when the body is destroyed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next