ईशावास्योपनिषद्

Isha Upanishadश्लोक 18/18100%

Isha Upanishad 1.18

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

हे अग्ने! तू हमारे सब मार्गों को जानने वाला है — हमें सुपथ से धन (कल्याण) की ओर ले चल। हमसे कुटिल, छलने वाले पाप को दूर रख। हम तुझे सबसे बड़ा नमस्कार करते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

O Agni, knower of all our paths, lead us by the good road to wealth. Keep from us the crooked, beguiling sin. To thee we offer the fullest praise.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

अन्तिम मन्त्र: अग्नि को प्रार्थना — आन्तरिक अग्नि, दिव्य बुद्धिमत्ता — कि वह साधक को सुपथ से परम कल्याण की ओर ले जाए और अहं के कुटिल छलावे से बचाए। उपनिषद् विजय से नहीं, विनम्रता से बन्द होता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक दुनिया में सफलता के नाम पर 'शॉर्टकट संस्कृति' (shortcut culture) और नैतिक पतन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। कॉरपोरेट घोटालों, फर्जीवाड़े, और व्यक्तिगत जीवन में लोग तात्कालिक लाभ के लिए झूठ, फरेब और कुटिल रास्तों को अपनाने में नहीं हिचकिचाते। मनुष्य का मन इतना चालाक है कि वह अपनी हर गलत हरकत के लिए कोई न कोई औचित्य (justification) गढ़ लेता है। यह आत्म-वंचना (self-deception) व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देती है और अंततः उसके पतन का कारण बनती है। ईशावास्य उपनिषद् का समापन किसी बौद्धिक दंभ से नहीं, बल्कि एक अत्यंत विनम्र और पावन प्रार्थना से होता है: "अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥" (हे दिव्य प्रकाशस्वरूप अग्निदेव! आप हमारे सभी कर्मों और मार्गों को जानने वाले हैं; हमें कल्याणकारी धन और परम पद की प्राप्ति के लिए सन्मार्ग (सुपथ) पर ले चलिए। हमारे भीतर के कुटिल पापों और भटकावों को हमसे दूर कीजिए। हम आपके प्रति बारंबार अत्यंत विनम्र प्रणाम समर्पित करते हैं!)। उपनिषद् सिखाता है कि चाहे आप कितने भी बड़े ज्ञानी क्यों न बन जाएं, अपनी अंतरात्मा की दिव्य अग्नि के आगे सदा विनम्र रहें और हर दिन कुटिल रास्तों से बचकर सत्य के सुपथ पर चलने की प्रार्थना करें।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सुपथ का चयन (Choosing the Upright Path)**: सफलता पाने के लिए अनैतिक शॉर्टकट, झूठ और छल-कपट का मार्ग मत चुनिए; कठिनाई के बावजूद धर्म और ईमानदारी के 'सुपथ' पर अडिग रहिए। - **कुटिल आत्म-वंचना से मुक्ति (Purging Self-Deception)**: अपने भीतर झांककर उन सूक्ष्म बहानों और कुटिलताओं को पहचानिए जिनसे आप अपनी गलतियों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं; अंतरात्मा की अग्नि में उन्हें भस्म कीजिए। - **समर्पण और विनम्रता का भाव (Surrender of the Ego)**: अपने ज्ञान या उपलब्धियों के अहंकार में मत रहिए; प्रतिदिन अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए उस परम शक्ति के आगे नतमस्तक होकर मार्गदर्शन की प्रार्थना कीजिए।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप सफलता की जल्दबाजी में कुटिल और अनैतिक शॉर्टकट्स का सहारा ले रहे हैं, अथवा आप हर परिस्थिति में अपने भीतर की दिव्य अग्नि से 'सुपथ' पर चलने का संबल मांगते हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

व्यवहार-शोध: आत्म-वंचना सबसे शक्तिशाली और सबसे कम ध्यान दी जाने वाली संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह है। मन जो पहले से चाहता है उसके लिए औचित्य गढ़ता है। अन्तिम प्रार्थना इसे पहचानती है — हमारी तर्क-शक्ति से गहरी एक आन्तरिक बुद्धिमत्ता (अग्नि) ही "छलने वाले पाप" को पहचान और रोक सकती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Kanva Recension, Shukla Yajurveda Samhita Ch. 40. Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages (GRETIL)
Translation
Gita Press Gorakhpur & Swami Nikhilananda
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Madhyandina recension transposes mantras 5 and 6 and alters initial phrasing in mantra 16.

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