ईशावास्योपनिषद्

Isha Upanishadश्लोक 12/1867%

Isha Upanishad 1.12

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो अव्यक्त (असम्भूति) की उपासना करते हैं, वे अन्धकार में प्रवेश करते हैं। जो केवल व्यक्त (सम्भूति) में रमण करते हैं, वे उससे भी अधिक अन्धकार में उतरते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Those who worship the Unmanifest (asambhūti) enter blinding darkness; those who delight only in the manifest (sambhūti) enter into darkness deeper still.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

श्लोक 9 के समानान्तर, पर भिन्न अक्ष पर: अब खतरा अव्यक्त परम (शुद्ध परात्परता) या व्यक्त जगत (शुद्ध अन्तर्यामिता) में एकपक्षीय स्थिरता है। अकेला या तो अन्धकार है; केवल उनका एकीकरण ही प्रकाश है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक मनुष्य अक्सर दो प्रकार के मानसिक भटकावों में फंसता है: एक ओर वह जो केवल अप्रकट, अमूर्त विचारों और दिवास्वप्नों में खोया रहता है, किंतु धरातल पर कुछ भी मूर्त रूप नहीं दे पाता; और दूसरी ओर वह जो केवल व्यक्त संसार की चमक-दमक, भौतिक गैजेट्स और नश्वर रूपों की पूजा में इतना पागल है कि वह उनके मूल कारण को भूल जाता है। केवल अमूर्त में खोए रहना आलस्य और शून्यवाद को जन्म देता है, और केवल भौतिक रूपों में उलझे रहना अंतहीन तृष्णा और संताप पैदा करता है। ईशावास्य उपनिषद् यहाँ चेतना के एक और गहरे द्वंद्व को सुलझाता है: "अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः॥" (जो केवल असम्भूति अर्थात् अप्रकट मूल प्रकृति/कारण की उपासना में लीन रहते हैं, वे अंधकार में प्रवेश करते हैं; और जो केवल सम्भूति अर्थात् कार्य-ब्रह्म या प्रकट संसार के रूपों में रमे रहते हैं, वे मानो उससे भी बड़े अंधकार में गिरते हैं)। उपनिषद् चेतावनी देता है कि न तो केवल अप्रकट शून्य में पलायन करना सही है, और न ही केवल नश्वर भौतिक वस्तुओं के पीछे भागना। एकांगी दृष्टिकोण हमेशा अंधकार की ओर ले जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **शून्यता और पलायनवाद से बचाव (Avoiding Passive Nihilism)**: "संसार सब भ्रम है" कहकर अपने दायित्वों से भागने या निष्क्रियता में डूबने की गलती न करें; अप्रकट सिद्धांतों को कर्म में उतारना आवश्यक है। - **भौतिक रूपों की नश्वरता का भान (Freeing from Object Addiction)**: केवल भौतिक वस्तुओं, बाहरी सुंदरता और उपभोक्तावादी चमक-दमक के दीवाने मत बनिए; यह समझें कि हर प्रकट रूप एक दिन मिट जाने वाला है। - **अप्रकट दृष्टि और प्रकट क्रिया का संतुलन (Balancing Vision and Manifestation)**: अपने जीवन में उच्च आदर्शों (अप्रकट) की कल्पना करें, और फिर उन्हें ठोस, मूर्त परिणामों (प्रकट) के रूप में धरातल पर उतारिए।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप केवल भौतिक रूपों और उपभोक्तावादी चमक के पीछे भागकर थक रहे हैं, या निष्क्रिय होकर शून्यता व पलायनवाद के अंधेरे में बैठे हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

आधुनिक भौतिकी को वास्तविकता का वर्णन करने के लिए Wave और Particle, Field और Excitation, Potential और Actual — दोनों चाहिए। जो सिद्धान्त केवल अव्यक्त क्षेत्र (Quantum Vacuum) या केवल व्यक्त कण लेता है, वह अपूर्ण चित्र देता है। उपनिषद् की संरचनात्मक अन्तर्दृष्टि समान है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Kanva Recension, Shukla Yajurveda Samhita Ch. 40. Göttingen Register of Electronic Texts in Indian Languages (GRETIL)
Translation
Gita Press Gorakhpur & Swami Nikhilananda
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Madhyandina recension transposes mantras 5 and 6 and alters initial phrasing in mantra 16.

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