श्रीमद्भगवद्गीता

Gyaan Vigyana Yogaश्लोक 1/303%

Bhagavad Gita 7.1

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

श्री भगवानुवाचमय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन ! मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योगका अभ्यास करता हुआ तू मेरे समग्ररूपको निःसन्देह जैसा जानेगा, उसको सुन।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The Lord said, "With your mind focused on Me, taking Me as your support, and practicing yoga—how can you, without doubt, know Me fully? Hear, O Arjuna."

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

सातवाँ अध्याय, 'ज्ञानविज्ञानयोग', गीता के दूसरे षट्क का आरम्भ है, जहाँ ध्यान की साधना से आगे बढ़कर भगवान अपने स्वरूप का रहस्य खोलना आरम्भ करते हैं। 'मय्यासक्तमनाः पार्थ', हे पार्थ, मुझमें आसक्त मन वाला होकर, 'योगं युञ्जन्मदाश्रयः', मेरा आश्रय लेकर योग का अभ्यास करते हुए, 'असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु', तुम मुझे संशय-रहित और समग्र रूप से जैसे जानोगे, वह सुनो। इस श्लोक का पहला शब्द ही अध्याय का स्वर निर्धारित कर देता है: 'मय्यासक्तमनाः', मुझमें आसक्त मन वाला। अब तक गीता आसक्ति छोड़ने की बात कर रही थी: फल से, विषयों से, कर्मों से। पर यहाँ भगवान स्वयं कहते हैं कि मुझमें आसक्त हो जाओ। यह वह एक आसक्ति है जो बाँधती नहीं, मुक्त करती है। संसार की आसक्तियाँ जंजीरें हैं; ईश्वर की आसक्ति वह डोर है जो हमें ऊपर खींचती है। 'समग्रम्', समग्र रूप से, यह शब्द एक बड़ा वचन है। भगवान केवल अपने एक पक्ष की नहीं, अपने पूर्ण स्वरूप की बात करने जा रहे हैं: वे सृष्टि में कैसे व्याप्त हैं, कैसे सबके आधार हैं, और फिर भी सबसे परे हैं। और यह ज्ञान 'असंशयम्', बिना किसी संदेह के होगा। यह श्लोक हमें आमंत्रित करता है कि अब ईश्वर को केवल एक विचार के रूप में नहीं, एक जीवित, सर्वव्यापी उपस्थिति के रूप में जानें। इस अध्याय को इसी प्रेमपूर्ण जिज्ञासा से पढ़िए।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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