श्रीमद्भगवद्गीता

Ksetra Ksetrajna Vibhaaga Yogaश्लोक 19/3554%

Bhagavad Gita 13.19

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको संक्षेपसे कहा गया। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे भावको प्राप्त हो जाता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Thus, the Ksetra, knowledge, and the object of knowledge have been briefly set forth. On knowing this, My devotee becomes fit to attain My state.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का वर्णन पूरा करके भगवान एक मधुर निष्कर्ष देते हैं, जिसमें ज्ञान का मार्ग भक्ति में आकर मिल जाता है। 'इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः', इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय संक्षेप में कहे गए; 'मद्भक्त एतद्विज्ञाय', मेरा भक्त इसे भली-भाँति जानकर, 'मद्भावायोपपद्यते', मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है। इस श्लोक में एक बहुत सुन्दर शब्द है: 'मद्भक्तः', मेरा भक्त। भगवान यह नहीं कहते कि ज्ञानी इसे जानकर मुझे पाता है; वे कहते हैं कि मेरा भक्त इसे जानकर मेरे भाव को पाता है। पिछले श्लोकों का सारा गम्भीर दार्शनिक विवेचन, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का भेद, ज्ञान के बीस लक्षण, ज्ञेय के विरोधाभास, यह सब अन्ततः भक्त के लिए है। यह गीता का एक मौलिक संदेश है: ज्ञान और भक्ति प्रतिद्वन्द्वी नहीं, सहयात्री हैं। ज्ञान भक्ति को स्पष्टता देता है, और भक्ति ज्ञान को मधुरता। जो भक्त यह जान लेता है कि भगवान ही सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ हैं, सबके हृदय में ज्योति हैं, उसका प्रेम अन्धा नहीं रहता; वह प्रकाशित हो जाता है। और 'मद्भावाय', मेरे भाव के लिए, यह बताता है कि ऐसा भक्त भगवान के स्वरूप में ही स्थित हो जाता है, जैसे लोहा अग्नि में रहकर अग्नि का भाव पा लेता है। यह श्लोक आपको बताता है कि यदि आप भक्ति के मार्ग पर हैं, तो ज्ञान से डरिए मत। शास्त्र को पढ़िए, समझिए; वह समझ आपके प्रेम को और गहरा करेगी।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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